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बच्चों की मौत का पैगाम

 
     
 

यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में गंभीर रूप से कमजोर होते बच्चों के मुद्दों के लिए राजनैतिक अर्थव्यवस्था में अब भी कोई स्थान नहीं है। बहुत समय नहीं बीता है, बजट जिस दिन पेश किया गया उसके ठीक तेरह दिन पहले श्योपुर के पातालगढ़ गांव में 13 बच्चों की कुपोषण से पैदा हुई बीमारी के कारण दर्दनाक मृत्यु हुई। इतना ही नहीं बीते वित्त वर्ष में खंडवा के खालवा, बड़वानी कें सेधवा, टीकमगढ़, दमोह बैतुल के भीमपुर ब्लाक में 193 बच्चों की मौते दर्ज हुई। मध्यप्रदेश सरकार का यह आंकड़ा होने के बाद भी कि 56 प्रतिशत कुपोषण के साथ प्रदेश भारत में कुपोषण के मामले में अव्वल है, एक भी जिम्मेदार और संवेदनशील कदम उठाने के बजाये औपचारिकताएं पूरी करने की जद्दोजहद शुरू हो गई है।

वैज्ञानिक स्तर पर यह माना जाता है कि वास्तव में कुपोषण परिवार की, गरीबी और उपेक्षा से उपजि स्थित है परन्तु मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह सिध्द है कि वास्तव में कुपोषण के कारण बच्चों की मौतें गंभीर राजनैतिक गैर जिम्मेदारी व्यवहार का परिणाम है। सबसे पहले तो यही उल्लेख होना चाहिए कि सत्ता पर आसीन होने के बाद तत्काल चुने हुए जन प्रतिनिधियों को यह ज्ञान प्राप्त होता है कि कुपोषण किसी भी स्तर का हो, उसके कारण बच्चों की मौत नहीं होती है, ऐसे ही एक वक्तव्य 6 दिसम्बर 2004 को महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री द्वारा भी विधानसभा में दिया गया। यह हमेशा होता रहा है कि राजनैतिक दल कोई भी हो वह बच्चों की मौतों के मामले को न उठाने का निर्णय लेने में ही अपने हित देखता है। इस सिध्दान्त के संकेत वर्ष 2005 के बजट में भी देखने को मिलता है। बीते वर्ष में महिलाओं एवं बच्चों के विकास के लिए लगभग 397 करोड़ रूपये का प्रावधान था जिसमें से मात्र 135 करोड़ रूपये की राशि ही व्यय हुई। इससे भी पोषण आहार कार्यक्रम पर केवल 85 करोड़ का प्रावधान किया गया था जबकि जरूरत 245 करोड़ रूपयों की थी। नये वर्ष के लिये मध्यप्रदेश सरकार ने विभाग के पूरे बजट में 400 करोड़ रूपये जरूरत को पूरा करने के लिये केवल 40 करोड़ रूपये की वृध्दि की है।
 
आज 53 लाख कुपोषित बच्चों को बेहतर पोषण आहार और स्वास्थ्य सुविधायें देने के लिये एक बच्चे पर 3.25 रूपये प्रतिदिन खर्च करने की जरूरत है परन्तु 1991 में किये गये एक रूपये के प्रावधान का अब तक पालन किया जा रहा है। 15 वर्ष में मंत्रियों, भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के अधिकारियों, यहां तक कि बाबुओं के मंहगाई भत्तों, में 3 से 5 बार बढ़ोत्तारी हो चुकी है। पर बच्चों पर होने वाला व्यय उतना ही है। स्थिति को बेहतर बनाने के लिए की गई हर पहल सरकार की जूते की नोंक पर होती है। शिवपुरी जिले में पिछले वर्ष आंगनबाड़ी और पोषण आहार कार्यक्रम पर 2.51 करोड़ रूपये के प्रावधान के विरूध्द केवल 90 लाख रूपये खर्च किये गये जबकि यह सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार सहरिया बच्चों का बहुल जिला है। इस मामले को सर्वोचच न्यायालय तक ले जाया गया, अदालत ने भी 4 बार कार्रवाई करने के निर्देश दिये परन्तु इसके बावजूद नवम्बर 2003 से दिसम्बर 2004 के बीच पिछोर विकासखण्ड में केवली 28 दिन दलिये का वितरण हुआ और सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने कोई जानकारी नहीं भेजी। खण्डवा के सैदाबार गांव में कोरकू आदिवासी बहुल कस्बे में आंगनबाड़ी ही नहीं थी क्योंकि 700 की जनसंख्या पर एक ही आंगनबाड़ी खोली जा सकती है और आंगनबाड़ी में 80 बच्चों को नामांकित करने का लक्ष्य उच्च वर्ग बहुल कस्बे से ही पूरा हो गया था, इसलिये आदिवासी बच्चों को वहां दाखिल नही किया गया। परिणाम स्वरूप एक ही मोहल्ले के 11 बच्चे मौत के शिकार हो गये। जनसंख्या का विचित्र प्रावधान बहुत तेजी से बच्चों की जान ले रहा है। ऐसा तय है कि मापदण्ड बनाने वाले अधिकारी और विशेषज्ञ आदिवासी इलाकों की संरचना के बारे में बुनियादी बात नहीं जानते हैं कि आदिवासी समुदाय छोटे-छोटे समूहों में निवास करते हैं। ज्यादातर इलाके जंगली एवं दुर्गम होते हैं। ऐसे में वहां 700 की आबादी की बसाहट का मतलब होता है 8 से 10 किलोमीटर का क्षेत्रफल। क्या ऐसी परिस्थिति में 6 साल से कम उम्र के बच्चे और गर्भवती महिलाएं आंगनबाड़ी तक पहुंच सकती हैं। यही पातालगढ़ में हुआ है जहां 80 बच्चे कुपोषित हैं किन्तु आंगनबाड़ी गांव से 17 किमी दूर है। सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्देश दिया है कि हर गांव में ही नहीं हर बस्ती में आंगनबाड़ी खोलने की जिम्मेदारी सरकार की है। परन्तु इस निर्देश को भी पालने के लिए इस बजट में कोई संकेत नहीं दिये गऐ हैं। अभी प्रदेश में 49600 आंगनबाडियां हैं जबकि जरूरत 1.10 लाख की है। प्रदेश में नई आंगनबाड़ी खुलवाने के लिए बच्चों की मौतें होना जरूरी माना गया है। मायने साफ है कि ये कदम उठाने के लिए इंसानियत की जरूरत है, जिसके अवशेष कहीं दिखाई नहीं पढ़ रहे हैं।

सवाल केवल बजट का ही नहीं है बल्कि जिम्मेदारी और जवाबदेहिता का भी है। जब सरकार ने दावा किया है कि कुपोषण से मुक्ति उसकी जिम्मेदारी है तो फिर बच्चों की मौत होने पर वह समाज के समक्ष आत्मसर्मपण क्यों नहीं करती? एक निहायत ही गैर जवाबदेय व्यवस्था के जाल में बच्चे फंस गये हैं, बच्चे वो, जो भूखे रहते हुए न कुछ मांग सकते हैं, न कुछ छीन सकते हैं। सरकार सहज ही बता देती है कि कुल प्रावधान का हमने 35 प्रतिशत हिस्सा ही व्यय किया है, तो इसके साफ मायने यह नहीं है कि सरकार 35 प्रतिशत बच्चों तक ही वहां पहुंच पायी। इसमें यदि भ्रष्टाचार का प्रावधान जोड़ दिया जाय तो कुछ 5 प्रतिषत बच्चों को ही सरकार की गंध महसूस हो रही है। कोई और छोटा सा अपराध करे तो कानून के नाम पर सरकार के कटघरे में होता है, पर सरकार बाल संहार करे तो कोई सवाल-जवाब भी नहीं होता है।

यह तय है कि अब संघर्ष उस दिशा में बढ़ना चाहिए जहां हर कर्मचारी, हर अधिकारी और हर प्रतिनिधि की जिम्मेदारी तय हो और वह कानून के दायरे में आये। अब इस मान्यता से बाहर निकलना होगा कि सरकार एक मुहर है और सरकार में जो व्यक्ति है उन्हें जिम्मेदार बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। यह जवाबदेहिता समाज और कानून दोनों के प्रति होना चाहिए।

Sachin Kumar Jain

 
     
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