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  अब केवल भूख से नहीं अन्याय से मुक्ति के लिये हो रोटी का कानून  
     
 

भुखमरी आज के समाज की एक सच्चाई है परन्तु मध्यप्रदेश के सहरिया आदिवासियों के लिये यह सच्चाई एक मिथक से पैदा हुई, जिन्दगी का अंग बनी और आज भी उनके साथ-साथ चलती है भूख। आर.वी. रसल और हीलाराल बताते हैं कि जब दुनिया की शुरूआत हो रही थी तब महादेव ने इंसानों को खेती करना सिखाना चाहा। इसके लिये उन्होंने एक हल बनाया और अपने नंदी बैल को जोतकर धरती पर ले आये। यहां आकर उन्होंने देखा कि चारों ओर तो जंगल हैं तब उन्होंने एक इंसान की रचना की जिसे ''सवर'' कहा गया। महादेव ने ''सवर'' को जंगल साफ करने के लिये कुल्हाड़ी दी और नंदी को वहीं छोड़कर दूसरा बैल लेने चले गये। सवर को जंगल साफ करने के बाद बहुत भूख लगी पर वहां खाने के लिये कुछ न था, तो सवर ने नंदी को मारकर खा लिया। फिर जब महादेव वापस आये तो जंगल को साफ देखकर बहुत खुश हुये और इनाम में जंगल से मिलने वाले भोजन, कंदमूल, औषधियों, फलों और जड़ों के बारे में संसाधन ज्ञान दिया। पर जब उन्हें नंदी नही दिखा तो उन्होंने उसे खोजा। महादेव को उसका कंकाल मिला और अमृत छिड़ककर उन्होंने नंदी को जीवित कर दिया। नंदी ने सारी घटना उन्हें कह सुनाई जिसे सुनकर महादेव क्रोधित हुये और सवर (जो बाद में सहरिया हुये) को श्राप दिया कि तुम संसाधनों के पास तो रहोगे पर गरीबी से मुक्त नहीं होओगे; तुम्हे कभी भर पेट भोजन नहीं मिलेगा और भूखे ही जिन्दगी बिताओगे।

यह कहानी कितनी सच है यह तो पता नहीं किन्तु सामाजिक बहिष्कार और राज्य की नीतियों का श्राप जरूर सहरिया आदिवासी भोग रहे हैं। यह एक पिछड़ी हुई जनजाति के रूप में परिभाषित हैं जो पोषण और स्वास्थ्य की असुरक्षा के कारण संकट में हैं। आज भारत के कुल 623 आदिवासी समूहों में से 75 जनजातियों को पिछड़ी जनजाति की श्रेणी में रखा गया है।

बिहार में मुसहर रहते हैं। यह शब्द स्पष्ट करता है कि इनका ''मूसक' यानी चूहों के साथ कोई न कोई संबंध है। जी हां, आज भी मुसहर चूहों को खाकर ही जिंदा रहते हैं, वे चूहों के बिलों तक जाते हैं और उनके द्वारा इकट्ठा किये गये अनाज के दाने लाकर अपने लिये खाना बनाते हैं।

उड़ीसा और झारखण्ड के कई इलाकों में लोग गाय और भैंस का गोबर इकट्ठा करके लाते हैं ताकि उसमें से ज्वार, और गेहूं के उन दानों को खोज सकें जो जानवर के पेट से बिना पचे गोबर के साथ बाहर आ जाते हैं। उन्हें धोकर-खाकर लोगों ने अपनी भूख को मिटाने की नाकाम कोशिश की।

आज भी भारत में 92 लाख शुष्क शौचालय विशेष को मानवमल ढोने का काम सौंपा गया। यह एक जाति आधारित काम बन गया। आज भी तीन लाख से ज्यादा अति दलित लोग मानव मल ढोने की असहनीय पीड़ा को भोगते हैं क्योंकि उनके पास गरीबी और भूख से जूझने का कोई और साधन नहीं है।

जबलपुर जिले के मझगंवा गांव के गनेश बर्मन को यह नहीं पता चला कि पांच साल पहले क्यों उसका नाम गरीबी की रेखा की सूची से हटा दिया गया। शायद यह सरकार की उस नीति का परिणाम था जिसके तहत सरकार गरीबी की विभीषिका को कम करने के लिये गरीबों की संख्या को घटा रही थी। उनकी एक एकड़ भरेल जमीन 7 हजार रूपये के एवज में 6 साल से गिरवी पड़ी है। दो हजार बीड़ी बनाने के एवज में उन्हें एक माह बाद ठेकेदार से 50 रूपये मिले। अक्सर भूखे सोना एक आदत सी बन गई थी। अब तो उन्हे उधार भी नहीं मिलता था। उनका 26 साल का बेटा संतू मानसिक बीमारी का शिकार है और बेटी सुनीता भूखे रहते-रहते 12 दिसम्बर 2009 को जिन्दगी की जंग हार गई। सरकार की योजनाओं से वे बाहर हो गये क्योंकि गरीबी की रेखा की रस्सी उनके गले में फांसी का फंदा बनकर अटक गई।

भारत में सात प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी विकलांगता से ग्रसित है, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। उन्हें पोषण की सुरक्षा की जरूरत है परन्तु विडम्बना यह है कि इस वर्ग को कोई संरक्षण नहीं है। इसी तरह महिलाओं, बच्चों, दलितों को भी अलग-अलग स्तर पर खाद्य सुरक्षा के कानूनी हक की दरकार है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार वंचित तबकों के लिये संरक्षण की बात कही। न्यायालय ने खाद्य सुरक्षा को जीवन और समानता के मौलिक अधिकार के साथ जोड़कर परिभाषित करते हुये कहा - ''अदालत की चिंता यह है कि गरीब लोग, दरिद्रजन और समाज के कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीड़ित न हों। इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है। इसे सुनिश्चित करना नीति का विषय है जिसे सरकार पर छोड़ दिया जाये तो बेहतर है। अदालत को बस इससे संतुष्ट हो जाना चाहिये और इसे सुनिश्चित भी करना पड़ सकता है कि जो अन्न भण्डारों में खासकर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरा पड़ा है, वह समुद्र में डुबोकर या चूहों द्वारा खाया जाकर बर्बाद न किया जाये।'' न्यायालय ने कहा कि ''भुखमरी की शिकार दरिद्र महिलाओं और पुरूर्षों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं तथा दरिद्र बच्चों, खासकर उन मामलों में, जिनमें वे या उनके परिवार के सदस्य उन्हें पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति में न हों, को भोजन उपलब्ध करवाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।'' सरकार को न्याय के इस मंतव्य का सम्मान करना चाहिये।

गरीबी की रेखा की सूची ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में पात्रता का आधार बनेगी। यह वही गरीबी की रेखा है जसे 6.52 करोड़ परिवार पकड़ पाये है पर 7.5 करोड़ परिवार इस सूची से बाहर कर दिये गये हैं। पहले योजना आयोग ने दावा किया था कि 28.3 प्रतिशत परिवार गरीब हैं पर बाद में उन्हीं के द्वारा स्थापित तेंडुलकर समिति ने बताया कि भारत में 37.5 प्रतिशत और गांवों में 41.8 प्रतिशत गरीब है। भारत सरकार ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा स्थापित डॉ. एन.सी. सक्सेना समिति ने सिध्द किया कि 50 प्रतिशत ग्रामीण गरीब हैं। 76.8 प्रतिशत को पूरा पोषण नहीं मिलता है और 77 प्रतिशत लोग 20 रूपये प्रतिदिन से कम में गुजारा करते हैं। पर सरकार केवल 28 प्रतिशत को ही गरीब मान रही है और उन्हें ही इस कानून का सीमित लाभ देने पर अड़ी हुई है।

इसी दौर में यह बात खुलकर सामने आ गई कि गरीबी की रेखा मापदण्ड वंचितों के भोजन के अधिकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार ने खर्च के जिन मापदण्डों (गांवों में 12 रूपये प्रतिदिन और शहरों में 19 रूपये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति से कम खर्च करने वालों को गरीब माना जा रहा है) को गरीबी की रेखा का आधार बनाया है उससे भरपेट भोजन भी मिलना संभव नहीं है यह राशि हमारी थाली में जरूरत का एक तिहाई से भी कम भोजन लाती है। अर्जुन सेन गुप्ता और उत्सा पटनायक के आंकलन साफ बताते हैं कि 80 से 84 करोड़ लोगों को नियमित रूप से सस्ते अनाज, दाल और तेल का अधिकार अब बेहद जरूरी हो गया है। भारत में हर दो में एक बच्चा कुपोषण और महिला खून की कमी की षिकार है। उन्हें सम्मानजनक जीवन का अधिकार तब तक संभव नहीं है जब तक कि उनकी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जायेगी। विसंगतिपूर्ण गरीबी की रेखा की परिभाषा और पहचान के तरीकों के कारण दो तिहाई लोग भूखे सोने को मजबूर हो रहे हैं। जब सरकार यह कहती है कि वह (विसंगतिपूर्ण और बहुत छोटी) गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को ही 25 किलो सस्ता राशन देगी तो हमें 'सवर के महादेव' इस सरकार में नजर आते हैं क्योंकि सरकार गरीबी और भूख के साथ जीने वालों की थाली को आधा ही भर रही है। इसमें भी दालें, खाद्य तेल और दूसरे मोटे-पोषक अनाज शामिल नहीं हैं। ऐसे में पेट की थैली में कुछ पड़ तो जायेगा पर उनकी पोषण सम्बन्धी जरूरत पूरी न हो पायेगी। इसलिये जरूरी है कि गेहूं ओर चावल की सूची में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी को शामिल करते हुये पात्रता को 56 किलो तक बढ़ाया जाये। इसके साथ ही सस्ती दर पर दाल और तेल का अधिकार भी तय हो।

आज राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की पहल थोड़ा जोर पकड़ रही है। इस कानून की कवायद ऐसे दौर में की जा रही है जब भारत दुनिया की सबसे तेज गति से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्था (वास्तव में रोजगार विहीन और सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाली प्रगति) मानी जाती है। इसी देश में दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भी रहते हैं। यहां 360 अरबपति हैं परन्तु यहां की 93 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या असंगठित क्षेत्र मे है। अनाज की कीमतें खूब बढ़ रही है, उत्पादन की दशा और दिशा बदल रही है। सराकर का संरक्षण किसानों, महिलाओं, विकलांगों से हट रहा है। भूख हमारे विकास के दावों को बार-बार सच का आईना दिखाती है पर सरकार उस सच से बार-बार मुंह फेर लेती है।

तेज आर्थिक विकास और यहां तक कि परिवार के स्तर पर पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध होने भर से स्थाई और संतोषजनक पोषण स्तर सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इन नीति (विकास की नीति) के कुछ दूरगामी प्रभाव भले हों लेकिन फिलहाल कुपोषण के चक्रव्यूह में फंसी आबादी को कोई राहत मिलती नहीं दीखती। इस वंचित वर्ग के पास जीने के लिये बहुत कम आयु है पर कम उम्र में मर जाने के लिए बहुत कुछ है।

राष्ट्रीय पोषण नीति 1993

भूतकाल में लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र के रूप में पहचाना गया, जिसमें मोटे तौर पर एक व्यक्ति का एक मत होता है। किन्तु मत का उस व्यक्ति के लिये कोई मतलब नहीं होता जो निर्धन और निर्बल है या जो भूखा है और भूख से मर रहा है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू, 25 फरवरी 1956

जो गरीब लोग इधर-उधर भटक रहे हैं, जिनके पास कोई काम नहीं है, जिन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती और जो भूख से मर रहे हैं, जो निरन्तर कचोटने वाली गरीबी के शिकार हैं, वे संविधान या उसकी विधि पर गर्व नहीं कर सकते।

उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन्

भूख़ के साथ जीना

तुम्हारी आखों ने यह तो देख ही लिया
उसने बेहद तल्ख़ अंदाज़ में दो तमाचे मार कर
अपने बच्चे को सोने के लिए कर दिया मजबूर
और बन गई अपराधी समाज कि
यह समाज न समझ पाया कभी भी
कि भूखे बच्चों को सुलाने के लिए
बहुत सी माओं के पास रोटी नहीं होती!
तुम बात करते रहे सभ्यता की
पर तुम क्यों नहीं पढ़ पाये
उनकी जिन्दगी का पहला अध्याय
जिसमे हर बच्चे को सिखाया जाता है भूख़ के साथ जीना
कचरे के डिब्बों में बिखरे अन्न के टुकड़ों
और गोबर के साथ गाय के पेट से निकल आये
ज्वार के दानों को बीन कर
अपनी थाली सजाते रहे हैं वो
और अपनी जिन्दगी को कल के सूरज तक
खींचने की कोशिश करने वाले
उन हाथों को नहीं ले पाये तुम अपने हाथों में
तुम्हारी आँखों ने देखे हैं बड़े-बड़े सपने
पर तुम यह क्यों न देख पाये उस बच्चे को
लार गलाकर रोटला निगलने की कोशिश करते
तुम अगर यह देख पाते तो न करते
भूख़ को नापने के सूचकों की खोज !!

भुखमरी का चेहरा

स्वतंत्रता के बाद भारत का पहला बजट 200 करोड़ रूपये का था। जुलाई 2009 में जब भारत के वित्तमंत्री ने बताया था कि अब बजट बहुत बदल गया है। 60 वर्षों में भारत के बजट का आकार 200 करोड़ से 5000 गुना बढ़कर वर्ष 2009 में 10 लाख करोड़ रूपये पर पहुंच गया, पर अफसोस यदि कुछ नहीं बदला, तो नहीं कम हुआ गरीबी और भुखमरी का दर्द। हम गर्व से आज यह नहीं कह सकते हैं कि भारत के आर्थिक विकास ने भारत के लोगों को भूखी रातों से मुक्ति दिला दी है। यहां आज भी हर रोज 36 करोड़ लोग पेट भरे बिना नींद के आगोश में जाते हैं।

सवाल यह है कि भारत का बजट जब 5000 गुना बढ़ता है, तब अनाज उत्पादन केवल चार गुना ही बढ़ पाता है।

ग्रामीण भारत में 23 करोड़ लोग अल्पपोषण के जाल में हैं और भारत में 50 फीसदी बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण है। 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में हर 3 में से एक व्यक्ति कमजोर है, जिनका बॉडी मास इंडेक्स 18.5 से कम है।

आज भारत में सरकार लगभग 22.8 करोड़ टन अनाज उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने की जद्दोजहद में है परन्तु वर्ष 2015 में इसे अपनी जरूरत पूरा करने के लिऐ 25 से 26 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी, इसके पूरा हो पाना संदेहास्पद है। भारत वैश्विक भुखमरी सूचकांक के संदर्भ में 119 देशों की सूची में 94 वें स्थान पर आता है।

दुनिया की 27 प्रतिषत कुपोषित जनसंख्या केवल भारत में रहती है। कुपोषित बच्चों का दुनिया का औसत 25 प्रतिशत है परन्तु भारत में 43 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के 70 फीसद बच्चों में खून की कमी है और 80 फीसदी बच्चों को विटामिन 'ए' की खुराक नहीं मिलती है। विश्व खाद्य कार्यक्रम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि वास्तव में खून की कमी के शिकार बच्चों की संख्या भारत में 6 प्रतिशत बढ़ गई है।

देश के 19 में से 11 राज्यों में 80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। पिछले छह वर्षों से भारत में ऊर्जा की सतत् कमी (क्रोनिक एनर्जी डेफिशियेंसी) का प्रकोप 40 फीसदी महिलायें लगातार भोग रही हैं। इसमें कोई कमी नहीं आई। इसका मतलब यह है कि भारत का विकास आंकड़ों का मकड़जाल है। यह लोगों की जिन्दगी में बदलाव का सूचक नहीं है। इसीलिये हमें पूर्ण खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला कानून चाहिये।

खाद्य सुरक्षा का व्यापक दायरा

खाद्य सुरक्षा की अवधारणा व्यक्ति के मूलभूत अधिकार को परिभाषित करती है। अपने जीवन के लिये हर किसी को निर्धारित पोषक तत्वों से परिपूर्ण भोजन की जरूरत होती है। महत्वपूर्ण यह भी है कि भोजन की जरूरत नियत समय पर पूरी हो। इसका एक पक्ष यह भी है कि आने वाले समय की अनिश्चितता को देखते हुये हमारे भण्डारों में पर्याप्त मात्रा में अनाज सुरक्षित होें, जिसे जरूरत पड़ने पर तत्काल जरूरतमंद लोगों तक सुव्यवस्थित तरीके से पहुचाया जाये। हाल के अनुभवों ने सिखाया है कि राज्य के अनाज गोदाम इसलिये भरे हुए नहीं होना चाहिए कि लोग उसे खरीद पाने में सक्षम नहीं हैं। इसका अर्थ है कि सामाजिक सुरक्षा के नजरिये से अनाज आपूर्ति की सुनियोजित व्यवस्था होना चाहिए। यदि समाज की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रहेगी तो लोग अन्य रचनात्मक प्रक्रियाओं में अपनी भूमिका निभा पायेंगे। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार का दायित्व है कि बेहतर उत्पादन का वातावरण बनाये और खाद्यान्न के बाजार मूल्यों को समुदाय के हितों के अनुरूप बनाये रखे। इस स्थिति को हासिल करने के लिये उत्पादन व्यवस्था को बाजार के बजाये समाज के प्रति जवाबदेय जरूरत है। इसके बिना भुखमरी से मुक्ति और खाद्य सुरक्षा की स्थिति को पा पाना संभव नही है।

2003 सरकार ने 21 करोड़ टन अनाज उत्पादन होने के बाद पूरी दुनिया के सामने घोषणा कर दी थी कि भारत खाद्यान्न के मामले में अब आत्मनिर्भर हो गया है। परन्तु इसी दौर में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी सामने आते हैं। 1980 की तुलना में 1990 के दषक में कृषि उत्पादन में कमी दर्ज की गई। जहां 1980 के दशक में उत्पादन वृध्दि क़ी दर 3.54 प्रतिशत थी वही 1990 के दशक में घटकर 1.92 प्रतिशत पर आ गई। इतना ही नहीं उत्पादकता की दर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 1980 उत्पादक की दर में सुधार की दर 3.3 प्रतिशत थी जो 1990 के दशक में घटकर 1.31 प्रतिशत हो गई है। बहुत संक्षेप में यह जान लेना चाहिये कि 1960 के दशक में हरित क्रांति के दौर में किसानों ने उच्च उत्पादन क्षमता वाले बीजों, रासायनिक ऊर्वरकों, कीटनाषकों और मशीनों का उपयोग करके प्रगति की तीव्र गति का जो रास्ता अपनाया था, अब उसके नकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गये हैं। इन साधनों से न केवल मिट्टी की उर्वरता कम हुई बल्कि कृषि की पारम्परिक व्यवस्था का भी विनाष हुआ है। सवाल यह है कि अगर हमने इतना विकास किया है कि उत्पादन 5 करोड़ टन से बढ़कर 20 करोड़ टन हो गया तो प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्ध 1951 में 395 ग्राम प्रति व्यक्ति से बढ़कर केवल 442 ग्राम तक ही क्यों पहुंच पाई?

भारत में खाद्यान्न और दाल की सकल उपलब्धता
वर्ष प्रति व्यक्ति एकल उपलब्धता (ग्राम प्रतिदिन) सभी तिलहन वनस्पति (किलोग्राम) शक्कर (किलोग्राम)
अनाज दालें कुल खाद्यान्न
1951
334.2 60.7 394.9 3.2 5.0
1961 399.7 69.0 468.7 4.0 4.8
1971 417.6 51.2 468.8 4.5 7.4
1981 417.3 37.5 454.8 5.0 7.3
1991 468.5 41.6 510.1 6.4 12.3
1992 434.5 34.3 468.8 6.5 12.7
1993 427.9 36.2 464.1 6.4 13.0
1994 434.0 37.2 471.2 6.8
13.7
1995 457.6 37.8 495.4 7.1 12.5
1996 442.5 32.7 475.2 7.3 13.2
1997 466.0 37.1 503.1 8.0 14.1
1998 414.2 32.8 447.0 9.0 14.6
1999 429.2 36.5 465.7 7.2 14.6
2000 422.7 31.8 454.4 9.8 14.6
2001 386.2 30.0 416.2 10.40 15.6
2002 458.7 35.4 494.1 9.4 15.8
2003 408.5 29.1 437.6 14.36 19.54
2004 426.9 35.8 462.7 24 13.29
2005 390.9 31.5 422.4 22.8 12.14
2006 412.8 32.5 445.3 25.68 17.52
2007 407.4 35.5 442.8 21.26 20.23
2008 374.6 41.8 436.4    
स्रोत: भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2009-10

अब सवाल केवल यहीं तक सीमित नहीं है। एक वर्ग दावा कर सकता है कि आज लोग अण्डे और मांस खा रहे हैं और दूध पी रहे हैं तो अनाज उपभोग में गिरावट चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए। एक पक्ष अभी भी उल्लेखनीय है और वह पक्ष है कैलोरी उपभोग का, जिससे तय होता है कि व्यक्ति को कितना पोषण आहार मिल रहा है। स्पष्ट है कि निम्न और मध्यम वर्ग यानी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा अभी अपने भोजन से न्यूनतम कैलोरी हासिल नहीं कर पा रहा है, जबकि यही गरीबी को मापे जाने का सबसे अहम् सूचक रहा है।

(ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति कैलोरी उपभोग - औसत)
वर्ग
1972-73 1977-78 1983-84 1993-94 1999-2000
निम्न वर्ग 1504 1630 1620 1678 1626
मध्यम वर्ग 2170 2296 2144 2119 2009
उच्च वर्ग 3161
3190 2929 2672 2463
कुल 2268 2364 2222 2152 2030

अनाजों और दालों की शुध्द उपलब्धि

खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाना आवष्यक है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि 1955-56 के दौरान खाद्यान्नों का औसत वार्षिक आयात 23 लाख टन था, जो 1961-62 से 1965-66 के दौरान बढ़कर 51 लाख टन हो गया और 1966-67 से 1970-71 के दौरान अपने चरम स्तर तक पहुंच कर 64 लाख टन हो गया। इसके पश्चात् 1971-72 से 1975-76 के दौरान यह कम होकर 36 लाख टन हो गया।

खाद्यान्न उपभोग

1972-73 से 1999-2000 की समयावधि में अनाज के प्रति व्यक्ति उपभोग में कमी आई है। जहां 1972-73 में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 15.3 किलोग्राम अनाज को उपभोग होता था, अब वह घटकर 12.22 किलोग्राम प्रतिमाह आ गया है। भारत देश के ग्रामीण इलाकों में भोजन के उपभोग का स्तर लगातार घट रहा है। 2005-06 में किसी परिवार का एक सदस्य औसतन 11.920 किलोग्राम भोजन का उपभोग करता था और उसके लिए परिवार 106.30 रुपए प्रतिमाह खर्च करता था। लेकिन 2006-07 में औसत भोजन का उपभोग घटकर मात्र 11.685 (1.97 प्रतिशत कम) किलोग्राम प्रति व्यक्ति रह गया और उसके लिए खर्च की जाने वाली राशि बढ़कर 114.80 रुपए हो गई।

अनाजों और दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि 1950-51 से 1955-56 के दौरान खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि 419 ग्राम प्रतिदिन थी जो 1996-97 और 2000-01 के दौरान बढ़कर 451 ग्राम हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि 50 वर्षों की अवधि में खाद्यान्नों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि में लगभग 15 प्रतिषत की वृध्दि हुई। इसके दो अहम् अंग हैं - अनाज और दालें। अनाजों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि जो 1950-51 और 1955-56 के दौरान 394 ग्राम प्रतिदिन थी बढ़कर 1996-97 और 2000-2001 के दौरान 418 ग्राम हो गई। खाद्यान्न (अनाज व दालें) की प्रति व्यक्ति वास्तविक जरूरत लगभग 520 ग्राम होती है और 2007 में कुल खाद्यान्न (अनाज व दालें) का प्रति व्यक्ति उत्पादन भारत में 493 ग्राम रहा, किन्तु प्रति व्यक्ति उपभोग महज 389 ग्राम रहा। सीधा सा आकलन यह है कि भारत में लोगों की भोजन की एक चौथाई थाली अब भी खाली है। 2008 में प्रति व्यक्ति उत्पादन 436.4 ग्राम रह गया। इस प्रकार 50 वर्षों की अवधि में प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धि मे 20-25 प्रतिषत की वृध्दि हुई, परन्तु अनाज लोगों की पंहुच से दूर ही रहा।

दालों के संदर्भ में प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1950-51 और 1955-56 के दौरान 65 ग्राम प्रतिदिन थी, जो गिरकर 2007 के दौरान 35.5 ग्राम और 2008 में 41.8 ग्राम हो गई। जाहिर है कि 50 वर्षों की अवधि में दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि में 50 प्रतिशत की कमी हुई। नौंवी पंचवर्षीय योजना ने इस बात पर बल देते हुए उल्लेख किया कि दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि में कमी के परिणामस्वरूप प्रोटीन के उपभोग पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है, ऐसा ही हुआ भी। मोटे अनाज; जिनकी उत्पादन लागत कम रही है, जो कम मंहगे भी हैं, कहीं अधिक कैलॉरी और पौषणीय तत्व उपलब्ध करा सकते हैं, पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इन्हे शामिल नही किया गया। यदि इन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर रियायती दरों (subsidized rates) पर उपलब्ध कराया जाए तो वे स्वयं-लक्षित बन सकेंगे और इनसे कैलौरी उपभोग उन्नत हो सकता है और इससे जनसंख्या के निर्धानतम भाग में 'भूख' कम की जा सकती है।


कैसे गलेगी दाल...?

दाल के बिना खाने की थाली पूरी नहीं हो सकता है परन्तु पिछले 18 महीनों में दालें थाली से लगभग बाहर हो गई हैं। इतनी महत्वपूर्ण है दालें पर फिर भी क्यों तुअर दाल 100 रूपये किलो हो गई, उड़द भी 95 रूपये तक पहुंची, मूंग और चना दाल 60 से ऊपर चली गई। केवल स्वाद से ही दूर नहीं हुई बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी नई चुनौतियां खड़ी कर देगा दाल का अकाल।

दालों की कमी और उत्पादन में उपेक्षा घातक है। खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में हमें यह समझना होगा कि दालें भारत के लोगों की थाली में प्रोटीन का सबसे अहम् स्रोत है। पारम्परिक और सांस्कृतिक खाद्य व्यवहार के मामले में भी एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक किसी न किसी रूप में दालों की एक सहज स्वीकार्यता रही है। यहां कुपोषण का एक बड़ा कारण प्रोटीन देने वाले खाद्यान्नों (दलहन) तक लोगों की कम होती पहुंच है। यह पता होते हुये भी हमें दालों की बहुत जरूरत है, भारत में नीतिगत स्तर पर इनके उत्पादन को बढ़ाने की कोशिशें नहीं हुई। इसके एवज में दूसरे देशों से आयात करने में भारत सरकार की हमेशा ज्यादा रूचि रही है।

उत्पादन - वर्ष 1959 में भारत में प्रतिव्यक्ति 74.9 ग्राम दालों का उत्पादन होता था किन्तु 2007-08 में यह गिरकर 35.5 ग्राम पर आ गया। इस दौरान जनसंख्या में दो गुना वृध्दि हो गई परन्तु उत्पादन कम होता गया।

दालों की सिंचाई - उत्पादन बढ़ाने के लिये जरूरी था कि दलहन के लिये सिंचाई का दायरा बढ़ाया जाता। पिछले 40 वर्षों में ऐसा नहीं लगता है कि दालों की महत्ताा सरकारें समझ पाई हों। 1970-71 में महज 20 लाख हेक्टेयर दलहन क्षेत्रफल सिंचित था और 2008 में 40 लाख हेक्टेयर जमीन ही सिंचित हो पाई। जरा यह जानिये कि 162 लाख हेक्टेयर दाल उत्पादन क्षेत्र में से अब भी केवल 16.2 प्रतिशत खेती ही सिंचित है।

उत्पादकता - 1970-71 में एक हेक्टेयर में लगभग 539 किलो दालें पैदा होती थी और अब 655 किलो उत्पादन होता है। दालों की उत्पादकता महज 20 फीसदी बढ़ पाई जबकि इस दौरान अनाजों की उत्पादकता 220 प्रतिशत तक बढ़कर 2175 किलो तक पहुंच गई। अब भी इस बात पर सरकार का ध्यान नहीं है कि 1960-61 में एक हैक्टेयर में 849 किलो तूअर पैदा होती थी और 2008-09 मेंं यह घटकर 678 किलो तक आ गई।

तकलीफ का अगला कारण यह है कि पिछले 50 वर्षों में दालों का सकल क्षेत्र बढ़ने के बजाये घट गया। 1960-61 में 236 लाख हेक्टेयर में दालें बोई जाती थीं और 2008-09 में सकल क्षेत्र 224 लाख हैक्टेयर रह गया। हमें हर साल 22 मिलियन टन दालें चाहिये पर 2008-09 में केवल 14.66 मिलियन टन दालें पैदा होने का अनुमान है। सवाल यह है कि क्या दालों के उत्पादन को बढ़ाये बिना स्थाई खाद्य सुरक्षा को हासिल करना संभव है?

आधी आबादी के सवाल

पोषण की कमी, भेदभाव, भांति-भांति की हिंसा और शोषण के कारण भारत में 427 लाख महिलाओं का अस्तित्व खत्म हो गया है। नैसर्गिक रूप से महिलाओं और पुरूर्षों की संख्या बराबर-बराबर होना चाहिये परन्तु भारत की कुल जनसंख्या में से महज 48.2 प्रतिशत ही महिलायें हैं। इस देश में एक लाख जीवित जन्म पर 301 महिलाओं की प्रसव से जुड़े कारणों से मृत्यु हो जाती है, यह दुनिया की सबसे खराब स्थिति वाले देशों में शुमार है। इस मान से लगभग 70 हजार मातृत्व मौतें हर साल भारत में होती हैं और इन मौतों का बड़ा कारण खून की कमी है और क्योंकि उन्हें पोषण की आपूर्ति ही नहीं हो पाती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण्ा के मुताबिक केवल 39.8 फीसदी महिलाओं को ही दूध या दही हर रोज सीमित मात्रा में मिलता है। 47.3 प्रतिशत महिलाओं को दाल या चने कभी-कभार मिलते हैं। यहा 55.3 प्रतिशत महिलायें खून की कमी की शिकार हैं और 35.6 प्रतिशत पोषण की कमी की स्थिति में हैं। कुछ मामलों में हमारी स्थिति मोरक्को, मलावी, चाड, इरीट्रिया से भी खराब है, जैसे जन्म के समय बच्चों का कम वजन होना। भारत में 28 फीसदी बच्चों का वजन जन्म के समय कम होता है। पिछले डेढ़ दशकों से भारत में राष्ट्रीय मातृत्व सुरक्षा योजना इसी मकसद से चलाई जाती रही कि प्रसव के 4 से 12 सप्ताह पहले महिलाओं को एक निश्चित राशि सरकार उपलब्ध करवाये, जिससे वे पोषण सम्बन्धी अपनी जरूरत को पूरा कर सकें; परन्तु जननी सुरक्षा योजना के लागू होने के साथ (जिसमें अस्पताल में प्रसव कराने पर बच्चे के जन्म के बाद आर्थिक मदद मिलती है) ही इस योजना पर लापरवाही का पलीता लगा दिया गया। जब जरूरत है तब सरकार मदद नहीं देती है अब। ऐसे में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत महिलाओं की खाद्य सुरक्षा के अधिकार शामिल होने पर ही उनके साथ न्याय होगा।

एकल और विधवा महिलायें

भारत जैसे विकासशील देशों में 60 से 80 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन महिलाओं के हाथों से होता है। पर पारम्परिक और सांस्कृतिक संदभों में महिलाओं के लिये सबसे बाद में, सबसे कम और कभी-कभी नहीं ही खाने का सिध्दान्त बना हुआ है। सत्ताा और संसाधन महिलाओं के साथ भेदभाव की मूल जड़ है, जिसमें पितृ सत्तात्मक सोच आधार का काम करती है। ऐसे में उन महिलाओं की स्थिति की कल्पना कीजिये जो अकेली हैं, विधवा हैं या जिनका तलाक हो चुका है। ऐसी महिलायें यौन आक्रमण की शिकार होती हैं और उन्हें दबाव डालकर मौन रहने के लिये मजबूर किया जाता है। उनके लिये कोई संरक्षण नहीं है। 1999 के उड़ीसा चक्रवात, 2001 के गुजरात भूकंप, 2002 के गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों के बाद ऐसी महिलाओं के यौन उत्पीड़न के हजारों मामले सामने आये। महिलाओं के इस वर्ग को समाज तो दूर परिवार में ही संरक्षण नहीं मिलता है। यह वर्ग कोई छोटा सा समूह नहीं है। 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में 6.9 प्रतिशत तलाकशुदा या परित्यक्ता हैं। इसके साथ ही 30 साल से ज्यादा उम्र की 1.4 प्रतिशत महिलायें अविवाहित हैं, जिन्हें भी एकल की श्रेणी में माना जा सकता है। इस तरह 7.5 प्रतिशत भारतीय महिलायें अकेली हैं और यह संख्या है चार करोड़ यानी कनाडा की जनसंख्या से ज्यादा।

इनमें से 2 करोड़ महिलायें 60 वर्ष से ज्यादा उम्र की हैं और हमारे पारम्परिक से मौजूदा सामाजिक ढांचें की यात्रा का अनुभव बताता है कि ये महिलायें हर क्षण सामाजिक बहिष्कार का सामना करती हैं इनकी खाद्य सुरक्षा का सवाल उतना ही बड़ा है जितना की जीवन का सवाल! एक स्तर पर खाद्य सुरक्षा का अधिकार महिलाओं के इस वर्ग को सम्मान का अधिकार दिला सकता है।

शहरी झुग्गी बस्तियां

शहरी झुग्गी बस्तियों और उनमें रहने वाले लोगों को एक सुनियोजित तरीके से समाज के ऊपर एक दाग के रूप में स्थापित करने की कोशिश हुई। यह कहा जाता रहा है कि वे अपराधी हैं; वे अनैतिक व्यापार करते हैं, मैले-कुचैले और गंदे हैं। यदि विकास करना है तो हमें उन्हें शहर से बाहर करना होगा। पर यह एक बुना गया झूठ है। एक कल्पना कीजिये कि यदि इन झुग्गी बस्तियों के लोग एक हफ्ते के लिये हड़ताल पर चले जायें तो तुम्हारी जिन्दगी क्या होगी? क्या तुम्हारे बच्चों के स्कूल का वाहन आयेगा, क्या घर के काम होंगे, क्या सब्जी मिलेगी, क्या शहर की सफाई होगी? नहीं !! जनब तुम्हारी जिन्दगी का पहिया है ये झुग्गी वाशिंदे। इनकी जिन्दगी को खत्म करने की नहीं अपने बराबर लाने की बात करो। भारत के 640 शहरों में 420 लाख लोग घोषित झुग्गी बस्तियों में रहते हैं और इनकी जिन्दगी का सबसे बड़ा सच है आधा खाली पेट। यहां 52 हजार झुग्गी बस्तियां हैं पर इनमें से केवल आधी को ही वैधानिक माना जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि तथा कथित अवैधानिक बस्तियों में 17 करोड़ बच्चे रहते हैं और अस्वच्छता के साथ भूख को जीते हैं। इन्हें न तो स्थाई पता मिलता है न पहचान। न पानी पीने को न बिजली और सफाई।

आय बहुत कम होने के कारण ये पोषणयुक्त भोजन पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों की आठवीं रिपोर्ट (पृष्ठ 62) के मुताबिक भारत में 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं किन्तु शहरी झुग्गी बस्तियों में 70 प्रतिशत बच्चे भूख के साथ जीते हुये कुपोषण के शिकार हो चुके हैं। शहरों का यह समाज केवल 9.55 किलोग्राम खाद्यान्न का हर माह उपभोग करता है। बस्तियों में 2970 आंगनबाड़ी केन्द्र खोलने की जरूरत है पर वैधानिक-अवैधानिक बस्तियों की बहस के बीच बच्चों को पोषण का अधिकार ही नहीं मिल पा रहा है। बस्ती के लोग अस्वस्थ्यकर वाली ऐसी परिस्थितियों में काम करते हैं जो कई बीमारियों का कारण बनती है और लगातार चलने वाली भुखमरी उन्हें उन बीमारियों से लड़ने की ताकत हासिल नहीं करने देती। इन बस्तियों में जीवन जीना हर दिन की एक चुनौती है पर फिर भी इन्हें खाद्य सुरक्षा का अधिकार देने में इतनी हिचक क्यों? क्या हम अपने ही समाज में एक नया भेदभाव पैदा नहीं कर रहे हैं?

वृध्दावस्था की पीड़ा

उस नीतिगत अंधेपन का इलाज किया जाना चाहिये जो समाज में ज्यादा उम्र के लोगों की परिस्थितियों को गरीबी के सूचकों से बाहर निकाल फेंकते हैं। विकास की जिस परिभाषा को हम लागू कर रहे है। उसमें उन वर्गों और लोगों को न तो सम्मान है न हीं स्थान, जो खुद श्रम करके आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाते है। ऐसे वृध्दजन सामाजिक बहिष्कार से जूझते हैं और भूख के साथ जीने को मजबूर हैं। वृध्दावस्था में केवल उम्र की पीड़ा का कारण नहीं है। जब कोई वृध्द महिला होती है तो पीड़ा दोहरी हो जाती है, विकलांगता की स्थिति में चौगुनी और दलित होने की स्थिति में कई-कई गुना बढ़ती जाती है। जो भूमिहीन और आश्रय विहीन हैं उन्हें तो मानों जीने का हक ही नहीं दिया गया है। इस वर्ग के सामने स्वास्थ्य और पोषण की जरूरतों की पूर्ति बड़ी जरूरत होती है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 7.7 करोड़ थी जो अगले 50 वर्षों में बढ़कर 30 करोड़ हो जायेगी। चूंकि भारत में महिलाओं की औसत उम्र ज्यादा है इसलिये इनमें ज्यादातर महिलायें होंगी। इन लोगों को ''भार'' माना जाने लगा है, ऐसे में सामाजिक मानसिकता में बदलाव के साथ-साथ राज्य की भूमिका इनके संरक्षण के मामले में ज्यादा बढ़ जाती है। एक अध्ययन के मुताबिक हर 1000 की कार्यशील जनसंख्या को 141 व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और संरक्षण देना होता है। भारत में अभी 12750358 वृध्दों को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृध्दावस्था पंषन योजना का लाभ मिल रहा है जबकि शेष 85 लाख अभी इससे वंचित हैं। इस योजना के फायदे को कानूनी अधिकार का रूप देने की जरूरत है।

विकलांगता

मौजूदा योजनायें आश्रयविहीनों, स्कूलों के बाहर के बच्चों और विकलांगों के खाद्य सुरक्षा हितों की अनदेखी करती है। इनमें विकलांग व्यक्तियों के लिये संकट बहुत गहरा है। भारत में 7285117 विकलांग व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे हैं परन्तु इनमें से महज 2684152 यानी केवल 37 प्रतिशत को ही विकलांगता पेंशन योजना का लाभ मिल रहा है। निश्चित रूप से राज्य के संरक्षण से यह वर्ग बड़े पैमाने पर छुटा हुआ है।

सचिन कुमार जैन

 
     
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