श्योपुर जिले के पतालगढ़ गांव में फरवरी 2005 में एक के बाद एक 13 बच्चों की कुपोषण के कारण मृत्यु हुई थी। संघर्ष और बहस के हर मंच पर यह मुद्दा उठा। सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों ने वहां आंगनबाड़ी खोलकर कुपोषण खत्म करने के निदेश दिये किन्तु चूंकि कुपोषण सरकार का प्राथमिक मुद्दा नहीं है इसलिये वहां आंगनबाड़ी नहीं खोली गई। परिणाम यह हुआ कि मार्च से मई 2006 के बीच वहां फिर 10 बच्चे असामयिक मौत के शिकार हो गये। इस गांव में पिछले तीन सालों में केवल पांच दिन का सरकारी रोजगार ग्रामीणों को मिला है, अस्पताल 63 किलोमीटर दूर है, मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी योजना का कोई अस्तित्व नहीं है क्योंकि यहां की जनसंख्या 700 से कम है। प्रसव के दौरान यहां हर 10 में से एक महिला की मृत्यु हो जाती है क्योंकि उन्हें भोजन नहीं मिलता है। जब एक नवजात शिशु की मां गुड्डी से पूछा गया कि अब इस बच्चे को आप अपना दूध कब पिलाओगी? तो उसका जवाब था- कहां से पिलाऊंगी? जब मैंने ही 7 दिन से कुछ नहीं खाया है तो दूध कहां से उतरेगा? वास्तव में संकट असुरक्षित मातृत्व से शुरू होता है और कुपोषण की कभी न मिटने वाली इबारत का रूप ले लेता है।
फिर एक व्यवस्था बच्चों की दोस्त कैसे हो सकती है जब वह बचपन को समझने और स्वीकार करने के लिये ही तैयार नहीं है। बहुत ही सामयिक उदाहरण है एक गांव का। झाबुआ जिले का आदिवासी बहुल कोटड़ा गांव 12 फलियों में बंटा हुआ है। परन्तु कुपोषित बच्चों की पहचान और उपचार के लिये चलाये जा रहे बाल संजीवनी कुपोषण निवारण अभियान के तहत इस में भी केवल एक ही दिन मेला लगा ताकि औपचारिकता पूरी की जा सके। अंतत: सरकार यह मानने लगी है कि कुपोषण गंभीर है परन्तु इससे निपटने के लिये उसके पास प्रतिबध्दता नहीं है। यही कारण है कि योजना बनाते समय इस वास्तविकता को नजरअंदाज कर दिया गया कि जिस समय यह अभियान चलाने की योजना बनाई गई है उस समय सोयाबीन की कटाई के लिये आधे से ज्यादा मजदूर और छोटे किसान गांव में रहेंगे ही नहीं तब कुपोषण की जांच किसकी होगी? वास्तव में बाजारवाद की हितैशी सरकार समुदाय की आत्मसम्मान की भावना का फायदा उठाती है। लोग नहीं चाहते हैं कि उन्हें भूखे के रूप में पहचाना जाये। वे अपमानित महसूस करते हैं। भूख तो तन को पीड़ा देती है पर भूखा कहे जाने पर मन टूट जाता है। ऐसे में वे जंगली वनस्पति, जड़ें या पत्तो खाते हैं ताकि मुंह को चबाने का अहसास हो और पेट को भरे होने का। फिर भले ही उससे शरीर को कोई ऊर्जा न मिलती हो। इस तरह के खाने से फेफड़ों में अकड़न, आंतों में सूजन, डायरिया, संक्रमण और गैस्ट्रोएनटरर्टिस होता हे। जब वे मर जाते हैं तो सरकार कहती है कि वे भूख से नहीं बीमारी से मरे हैं। ऐसी मौतों में सबसे ज्यादा संख्या बच्चों की होती है।
कुपोषण और बच्चों के पोषण के अधिकार का मुद्दा आज के दिन बहुत अहम् इसलिये हो जाता है क्योंकि भारत की केन्द्रिय और राज्य सरकारें राष्ट्र के विकास के लिये 11वीं पंचवर्षीय योजना की रूपरेखा बनाने में जुटी हुई हैं। विकास की जिस सोच का सरकारों पर आज गहरा प्रभाव है वह विकास की दर को प्रतिशत में मापती है। योजना आयोग ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिये जो दृष्टिपत्र जारी किया है उसके अनुसार सड़कें, इमारतें और तालाब बनाने वाले कार्यक्रमों से विकास का लक्ष्य हासिल किया जायेगा; किन्तु योजना आयोग यह भूल रहा है कि गरीबी और भुखमरी के कारण समाज का दो तिहाई तबका इतना कमजोर हो चुका है वह इन इमारतों- सड़कों का उपयोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये नहीं कर पायेगा। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून रोजगार के संकट से निपटने के लिये लागू किया गया किन्तु शुरूआती छह माह के अनुभव हमें बताते हैं कि इस कानून के अन्तर्गत मजदूरों को शारीरिक श्रम के आधार पर न्यूनतम मजदूरी मिलेगी। न्यूनतम मजदूरी पाने के लिये उन्हें एकनिर्धारित लक्ष्य (टास्क) पूरा करना होगा। पर मध्यप्रदेश के शिवपुरी, उमरिया और खण्डवा जिले के जरूरतमंद आदिवासी इतना शारीरिक श्रम नहीं कर पा रहे हैं। कारण साफ है; वे शारीरिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि वे 100 घनफीट की खुदाई का काम सात घंटे में कर सकें। जिस गरीबी के अंधेरे को मिटाने के लिये रोजगार कानून आया वहीं अब कअव्यावहारिक सोच के चलते शोषण का जरिया बन रहा है। ऐसा नहीं है कि मजदूर श्रम नहीं करना चाहता है बल्कि सच यह है कि कुपोषण के ऊंचे स्तर के चलते वह भारी श्रम नहीं कर पा रहा है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि अगली पंचवर्षीय योजना में पोषण के अधिकार को कार्ययोजना का आधार बनाया जाये। इसके अभाव में सरकार यदि 10 प्रतिशत की विकास दर यदि हासिल कर भी लेगी तो निश्चित रूप से उसके कोई फायदे नहीं होंगे। कुपोषित बचपन से कमजोर वयस्क का ही निर्माण होगा और कमजोर वयस्क निर्माण में कोई भूमिका नहीं निभा पायेगा।
सन् 1975 में यह मानते हुये कि कुपोषण और सतत् बरकरार रहने वाली भुखमरी की स्थिति को मिटाये बिना स्वस्थ्य, उत्पादक और समतामूलक समाज स्थापित नहीं किया जा सकता है, एकीकृत बाल विकास परियोजना शुरू की गई। कारण साफ है कि जब बचपन ही लुंज-पुंज और कमजोर होगा तो युवा कैसे सशक्त हो सकता है। तब एक व्यापक नजरिये को आधार बनाकर आंगनबाड़ी कार्यक्रम की शुरूआत की गई थी। एक लम्बे दौर तक इस कार्यक्रम को दोयम दर्जे का महत्व दिया जाता रहा। 31 साल गुजर गये पर बचपन की भुखमरी को समाप्त नहीं किया जा सका। नि:संदेह सरकारी प्रचार वाक्य के अनुसार यह दुनिया का सबसे बड़ा कुपोषण निवारण अभियान है और यही कारण है कि यह दुनिया का सबसे अव्यावहारिक ढंग से चलाया गया अभियान भी है। इसका प्रमाण यह है कि वर्ष में दो बार चलने वाला यह अभियान ऐसे महीनों में चलाया जाता है जब गांव के लोग फसल काटने पलायन पर गये होते हैं। इसमें पारिवारिक खाद्य सुरक्षा की बात न होकर कुपोषित बच्चों के गरीब परिजनों को पौष्टिक भोजन के उपयोग की सलाह दी जाती है। मध्यप्रदेश सरकार के लिये आज भी यह राजनैतिक प्राथमिकता का मुद्दा नहीं है। अभी केवल 23 फीसदी बच्चों को ही पोषण और स्वास्थ्य की सीमित सेवायें मिल रही हैं।
वहीं दूसरी ओर अधोसंरचनात्मक स्थिति भी राजकीय उदासीनता के तर्क को ठोस रूप प्रदान करती है। राज्य सरकार यह मानती है कि बच्चों में कुपोषण की स्थिति से निपटने के लिये उसे अब भी 50 हजार आंगनबाड़ियों की जरूरत है परन्तु केन्द्र सरकार की अनुमति के बिना एक भी आंगनबाड़ी स्थापित नहीं की जा सकती है क्योंकि बजट केन्द्र से आता है। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार ने अपनी ओर से राज्य बजट आंगनबाड़िया खोलने की प्रक्रिया शुरू नहीं की। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार वर्तमान में मौजूद 6 लाख आंगनबाड़ियों की संख्या बढ़ाकर 14 लाख करने की जरूरत है। इसके बाद 29 दिसम्बर 2004 के केन्द्रीय केबिनेट ने 1.88 लाख नई आंगनबाड़ियां खोलने का निर्णय तो ले लिया परन्तु अब तक इसमें औपचारिक निर्देश जारी नहीं हो पाये। जिस प्रषासनिक प्रक्रिया का पालन सरकार करती है उसके अनुसार मध्यप्रदेश के वंचित उपेक्षित बच्चों को जून 2008 से पहले यह आंगनबाड़ियां देखना नसीब नहीं होगा।
एक अहम् मुद्दा आंगनबाड़ियों के सामाजिक चरित्र से जुड़ा हुआ है। सरकार ने कभी यह प्रयास नहीं किया है कि आंगनबाड़ी एक बाल विकास सामाजिक केन्द्र के रूप में समाज द्वारा स्वीकार किया जाये। यहां तक कि योजना आयोग द्वारा समय-समय पर जारी किये गये चार आदेशों से यह पता चलता है कि बुनियादी रूप से यह गरीब, वंचित, भूखे और उपेक्षित बच्चों का केन्द्र मानने की परम्परा डाली गई। इस धारणा का प्रभाव यह हुआ कि गांव में आंगनबाड़ी केन्द्र के आदर्श रूप को विस्मृत कर दिया गया। यहां आने वाले बच्चों के परिवारों को एक नये वर्ग के रूप में पहचाना जाने लगा। छतरपुर के जटाशंकर बड़ागांव में सालों आंगनबाड़ी चल रही है परन्तु फिर भी वहां कुपोषण के कारण पांच दलित बच्चों की मृत्यु हो गई। अध्ययन करने पर पता चला कि उच्च वर्ग के मोहल्ले में स्थापित आंगनबाड़ी में दलित बच्चों को जाने की अनुमति नहीं है। उस केन्द्र की कार्यकर्ता ने दलित बच्चों के लिए कुछ कोशिश भी की पर राज्य आर समाज दोनों ने ही उसके साथ नकारात्मक व्यवहार किया।
आंगनबाड़ी केन्द्रों में आमतौर पर पोषण आहार नियमित रूप से वितरित नहीं होता है। कारण है बजट की कमी, प्रतिबध्दता का अभाव और भ्रष्टाचार। जब आंगनबाड़ी को साधन और संसाधन नहीं मिलते है तो उसे स्थानीय समुदाय नकारात्मक नजरिये से देखने लगता है। सीधी जिला मध्यप्रदेश का सबसे ज्यादा कुपोषण प्रभावित जिला रहा हे। परन्तु वहां आंगनबाड़ी कार्यक्रम की जमीनी स्थिति यह है कि सीधी ब्लाक की 187 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 16 से 28 माह से मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है। फिर भी उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे बच्चों को घर से लायें, उन्हें नहलायें, खाना पकायें, खिलायें, 8 रजिस्टर भरें, सर्वेक्षण करें, गर्भवती-धात्री महिलाओं की देखभाल करें पर यह अपेक्षा न करें कि राज्य से उन्हें निर्धारित साधन-संसाधन मिलें। इतना ही नहीं जब वे आंगनबाड़ी भवन के किराये का भुगतान नहीं कर पाई तो 9 भवनों के स्वामियों ने उनका सामान बर्तन और रजिस्टर जब्त करके केन्द्र खाली करा लिया। वे तमाम उपेक्षाओं के बावजूद बच्चों को सामाजिक संरक्षण देना चाहती हैं परन्तु जब वे गंभीर रूप से बीमार बच्चों को ए.एन.एम. या शासकीय चिकित्सालय भेजती हैं तो उन्हें वहां स्वास्थ्य विभाग की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। वास्तव में डिण्डोरी जिले के किवाड़ गांव का उदाहरण राज्य के नजरिये की व्याख्या कर देता हे। इस गांव में ग्यारह माह की उम्र के दो बच्चों की कुपोषण जन्य बीमारी से अकाल मृत्यु हो गई। जब इस प्रकरण की सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त के निर्देशों पर जांच की गई। सरकार ने बिना स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधित्व के कराई गई इस जांच रिपोर्ट में कहा कि बच्चे कुपोषित थे परन्तु उनकी मौत माता-पिता की लापरवाही से हुई है। यह बात सही है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को छह माह से मानदेय नहीं दिया गया था, वहां पोषण आहार भी नहीं पहुंचा था और इस मामले में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को पद से हटा दिया गया है। अब समझने वाली बात यह है कि बच्चों की मौत के लिये प्रशासन की जिम्मेदारी तय होना चाहिये या सरकारी अपमान की शिकार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की। सरकार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के चयन की प्रक्रिया में गरीब, दलित आदिवासी या विधवा महिला को चुनती है ताकि उनका शोषण किया जा सके और विपरीत परिस्थितियों में अपराधी घोषित करके अपना दामन बचाया जा सके। किवाड़ गांव का यह उदाहरण नीतिगत चरित्र की व्याख्या कर देता है कि जब व्यवस्था की लापरवाही से आपदा आती है तो कभी भी बड़े अफसरों और नीति बनाने वालों की जवाबदेही तय नहीं होगी।
आज 53 लाख कुपोषित बच्चों को बेहतर पोषण आहार और स्वास्थ्य सुविधायें देने के लिये एक बच्चे पर 3.25 रूपये प्रतिदिन खर्च करने की जरूरत है परन्तु 1991 में किये गये एक रूपये के प्रावधान का अब तक पालन किया जाता रहा है। 15 वर्ष में मंत्रियों, भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के अधिकारियों, यहां तक कि बाबुओं के मंहगाई भत्तों, में 3 से 5 बार बढ़ोत्तारी हो चुकी है पर बच्चों पर होने वाला व्यय उतना ही है। खण्डवा के सैदाबार गांव में कोरकू आदिवासी बहुल कस्बे में आंगनबाडी़ी ही नहीं थी क्योंकि 700 की जनसंख्या पर एक ही आंगनबाड़ी खोली जा सकती है और आंगनबाड़ी में 80 बच्चों को नामांकित करने का लक्ष्य उच्च वर्ग बहुल कस्बे से ही पूरा हो गया था, इसलिये आदिवासी बच्चों को वहां दाखिल नही किया गया। परिणाम स्वरूप एक ही मोहल्ले के 11 बच्चे मौत के शिकार हो गये। जनसंख्या का विचित्र प्रावधान बहुत तेजी से बच्चों की जान ले रहा है। ऐसा तय है कि मापदण्ड बनाने वाले अधिकारी और विशेषज्ञ आदिवासी इलाकों की संरचना के बारे में बुनियादी बात नहीं जानते हैं कि आदिवासी समुदाय छोटे-छोटे समूहों में निवास करते हैं। ज्यादातर इलाके जंगली एवं दुर्गम होते हैं। ऐसे में वहां 700 की आबादी की बसाहट का मतलब होता है 8 से 10 किलोमीटर का क्षेत्रफल। क्या ऐसी परिस्थिति में 6 साल से कम उम्र के बच्चे और गर्भवती महिलाएं आंगनबाड़ी तक पहुंच सकती हैं।
अब आंगनबाड़ी की स्थापना के लिये जनसंख्या का प्रावधान हटाने की जरूरत है। सरकार तय करे कि हर बसाहट में एक आंगनबाड़ी या फिर लोगों की मांग पर आंगनबाड़ी की तत्काल स्थापना की जायेगी। सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्देष दिया है कि हर गांव में ही नहीं, हर बस्ती में आंगनबाड़ी खोलने की जिम्मेदारी सरकार की है। परन्तु इस निर्देश को भी पालने के लिए कई बार कें बजटों में कोई संकेत नहीं दिये हैं। अभी प्रदेश में 49600 आंगनबाडियां हैं जबकि जरूरत 1.10 लाख की है। प्रदेश में नई आंगनबाड़ी खुलवाने के लिए बच्चों की मौतें होना जरूरी माना गया है। मायने साफ है कि ये कदम उठाने के लिए इंसानियत की जरूरत है, जिसके अवशेष कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। सवाल केवल बजट का ही नहीं है बल्कि जिम्मेदारी और जवाबदेहिता का भी है।
विकास की परिभाषा का मूल उद्देश्य समाज को एक समतामूलक बेहतर स्थिति प्रदान करना है। ऐसे में व्यापक सैध्दान्तिक योजना बनाते समय सबसे पहले सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि पोषण की कमी से एक व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक विकास बाधित होता है। मध्यप्रदेश में 60 प्रतिशत बच्चों का जन्म के समय ही वजन ढाई किलो से कम होता है जिसके कारण उनकी दिमागीय संरचना का विकास नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। इसी कारण उसके सीखने (बचपन से) और समझने की ताकत नहीं बढ़ पाती है। ऐसे में जब हम इन बच्चों की शिक्षा की बात करते हैं तो वास्तव में पोषण की कमी के फलस्वरूप शिक्षा से विकास की सोच बेमानी हो जाती है। और जब शिक्षा की स्थिति का विश्लेषण होता है तब बीच में ही स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति के बारे में भांति-भांति के तर्क दिये जाते हैं। स्पष्ट रूप से पोषण की कमी से सीखने की क्षमता बहुत कम होती है जिससे बच्चे मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था में टिक नहीं पाते हैं और जब वे शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं तो उन्हें सीखने के अवसर भी नहीं मिलते हैं। जिससे उन्हें भविष्य में रोजगार और आजीविका की असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह असुरक्षा उन्हें और ज्यादा गंभीर कुपोषण की दिषा में बढ़ाती है। एक तरह से यहीं से कुपोषण एक दुष्चक्र का रूप ले लेता है।
बजट की कमी
वर्ष 2001 से 2005 तक कुपोषण से निपटने के लिये चलाई गई योजना (एकीकृत बाल विकास परियोजना) का हश्र क्या हुआ है; इसका मध्यप्रदेश के परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिक विश्लेषण किया जा सकता है। इस अविध में (जो कि नवीं पंचवर्षीय योजना से दसवीं पंचवर्षीय योजना में प्रवेश का दौर था) महिला एवं बाल विकास विभाग को कुल 1685.64 करोड़ रूपये का बजट आवंटित किया गया। इस आवंटित राशि में से राज्य विभाग 1210.34 करोड़ रूपये ही खर्च कर पाया यानी 475.30 करोड़ तो उपयोग ही नहीं हो सके। एक तरह से पांच में से दो वर्ष का बजट खर्च ही नहीं हो पाया। जबकि वहीं दूसरी ओर जब व्यवस्था को ठोस और ज्यादा समुदाय आधारित बनाने की बात कही जाती है तो सरकार बजट की कमी का तर्क देती है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में सरकार को आज यह सुनिश्चित करना होगा कि इस राज्य की छवि को बीमारू राज्य की छवि से यदि मुक्त कराना है तो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में पोषण आहार के लिये 6500 करोड़ (तीन रूपये प्रति बच्चा प्रतिदिन), आंगनबाड़ियों को रोचक बनाने के लिये 928.40 करोड़ रूपये का प्रावधान करें।
31 वर्षों से संचालित हो रही आईसीडीएस योजना की सफलता की दर 0.25 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही है और इस धीमी दर का कारण यह है कि पोषण की कमी के मुद्दे को राजनैतिक हलकों में गंभीरता के साध नहीं स्वीकार किया गया। पिछले पांच वर्षों में मध्यप्रदेश में पोषण आहार कार्यक्रम के हितग्राही के रूप में 253.84 लाख बच्चों और महिलाओं की पहचान की गई थी। इन्हें पोषण आहार उपलब्ध कराने के लिये 741.05 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया था परन्तु सरकार ने केवल 313.93 करोड़ रूपये खर्च करने में रूचि दिखाई। मध्यप्रदेश के महालेखाकार द्वारा किये गये अंकेक्षण यह अधिकृत रूप से घोषित करते हैं कि इसी अवधि का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि यह कार्यक्रम 62 से 52 फीसदी बच्चों और 46 से 59 प्रतिशत गर्भवती-धात्री महिलाओं तक नहीं पहुंचा है। प्रदेश की स्थिति शिशु मृत्यु और मात् मृत्यु दर के मामले में बहुत ही शर्मनाक है। अपेक्षा यह की जाती है कि महिला एवं बाल विकास आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के जरिये गांवों में होने वाली शिशु और मातृ मृत्यु पर नजर रखेगा और स्वास्थ्य विभाग से समन्वय स्थापित कर जरूरी कदम उठाये जायेंगे। वर्ष 2001 से 2005 की अवधि में मध्यप्रदेश में 6.10 लाख बच्चों (एक वर्ष से कम उम्र के) और 65 हजार महिलाओं की प्रसव से जुड़े कारणों से मृत्यु हुई परन्तु महालेखाकार अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि सरकार को भेजी जाने वाली मासिक प्रगति प्रतिवेदन (एमपीआर) में गांव में होने वाली शिशु-मृत्यु और मातृ मृत्यु का जिक्र नहीं होता है।
निगरानी व्यवस्था
निगरानी व्यवस्था तो जैसे चरमरा गई है और लगता है कि सोच-समझकर इस व्यवस्था को खोखला किया गया है। एकीकृत बाल विकास परियोजना को संचालित करने में ग्राम सभा और पंचायतों को सुझाव देने के अधिकार हैं, उन्हे स्वीकार-अस्वीकार करने का हक अफसरों का ही है। जब पोषण आहार आंगनबाड़ी केन्द्र पर पहुंचेगा तो पंचायत को यह देखना है कि पोषण आहार बंटे, किन्तु इस सच्चाई से उनका कोई वास्ता नहीं होगा कि गांव में सालभर में से 9 महीने आहार पहुंचता ही नहीं है। आंगनबाड़ी गांव की स्थिति पर सूक्ष्म निगरानी रखने और उसे सहज बनाने का माध्यम है। विभागीय संरचना में आंगनबाड़ी सुपरवाईजर 20 से 30 आंगनबाड़ियों और विकासखण्ड स्तर पर बाल विकास परियोजना अधिकारी के बीच समन्वय की जिम्मेदारी निभाती है परन्तु प्रदेश में स्वीकृत 2063 सुपरवाईजर के पदों में से 549 पर खाली पड़े हैं। और अब यह सुनाई दे रहा है कि सरकार जमीनी अमला बढ़ाने के बजाये उपसंचालक और उससे ऊपर के नये पद सृजित करने की योजना बना रही है यानी सेना कम होगी और सेनापति ज्यादा।
इसी तरह पोषण आहार की आपूर्ति का मासला भी एक गंभीर रूप लेकर सामने आया हैं वर्ष 2002 में सरकार ने यह निर्णय लिया था कि आंगनबाड़ियों को पोषण आहार भेजने का काम दलित-आदिवासी महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जायेगा। इससे 750 समूहों को फायदा होने वाला था किन्तु वर्ष 2006 में सरकार ने नीति फिर बदल दी। अब निजी निर्माता डेढ़ सौ करोड़ रूपये का पोषण आहार बनायेगें और आंगबाड़ियों को भेजेंगे। पिछले पांच वर्षों के अनुभवों के बारे में सरकार कहती है कि दलित आदिवासी समूह अभी पोषण आहार बनाने में सक्षम नहीं है पर महालेखाकार का अध्ययन कहता है कि पोषण आहर की आपूर्ति में दो सालों में ही 20 करोड़ रूपये का घोटाला नजर आता है क्योंकि जिन स्वयं सहायता समूह वास्तव में पिछड़े समूहों की महिलायें नहीं चला रही हैं बल्कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, ठेकेदार और अफसरों के द्वारा बनाये गये समूह पोषण आहार लील रहे हैं। और सजा भुगत रहे हैं दलित-आदिवासी समूह। पोषण का अधिकार कार्यक्रम क्रियान्वित करने और निगरानी करने में स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेय भूमिका अभी भी तय की जाना शेष हैं। मध्यप्रदेश का अनुभव माथे पर बल ला देता है क्योंकि यहां कुपोषण की समस्या से निपटने के लिये होने वाले सीमित प्रयासों में भी स्वास्थ्य विभाग की किंचित मात्र ही भूमिका नजर आई है। इस भूमिका की पहले जांच होना चाहिये और फिर उसमें जवाबदेहिता तय की जाना चाहिये। आश्चर्य की बात है कि प्रदेश स्वास्थ्य नीति शिशु मृत्यु दर कम करने की बात कहती है किन्तु कुपोषण को मिटाने का लक्ष्य उसकी नीति का हिस्सा नहीं है।
निगरानी व्यवस्था को जवाबदेहिता के साथ लागू करने की जरूरत है। 1975 में जन्में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम की उम्र अब 31 साल की हो चुकी है और विश्लेषण यह कहते हैं कि कुपोषण, मातृ - शिशु मृत्यु, किषोरी स्वास्थ्य और टीकाकरण जैसे महत्वाकांक्षी दायित्वों को पूरा करने के लिये लागू की गई इस योजना की सफलता की दर 0.25 प्रतिवर्ष रही है। ऐसा नहीं है कि भवन और पोषण आहार की कमी के कारण 31 साल में 12 प्रतिशत कुपोषण ही कम हो पाया। वास्तविकता यह है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिये जुटने की राजनैतिक प्रतिबध्दता भी कहीं नजर नहीं आई।
पिछले 25 वर्षों में मध्यप्रदेश की सरकारों ने प्राथमिकता के साथ विकास के लिये औद्योगिकीकरण की नीति को लागू किया। इस नीति से न तो प्रदेश में उत्पादक औद्योगिकीकरण हो पाया न ही कुपोषण और अन्य पोषण के संकट को चुनौती ही दी जा सकी। अब 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार को पोषण की कमी को दूर करना अपना प्राथमिक लक्ष्य रखना चाहिये। इससे स्वास्थ उत्पादक बढ़ेगी। सरकार को स्वीकार करना होगा कि बीमार बच्चों से बीमार युवा पीढ़ी का निर्माण होगा और बीमार युवा पीढ़ी राज्य के सपनों को पूरा नहीं कर पायेगी। यह विश्वबैंक से आयातित विचारधारा है कि विकास से पोषण की कमी दूर होगी। पर वास्तविकता यह है कि पोषण की कमी जब तक रहेगी विकास नहीं हो पायेगा। यहां श्रीलंका जैसे गृह युध्द से ग्रस्त देश का उदाहरण रख देना निरर्थक नहीं है। श्रीलंका में पिछले तीन दशकों से अषांति का वातावरण बना हुआ है किन्तु समाज और राज्य ने महिलाओं, बच्चों के पोषण के अधिकार को संरक्षित किया जिससे तमाम विपदाओं के बावजूद भी वहां कुपोषण और मातृ मृत्यु की दर बिल्कुल नगण्य है यानी भूख से मृत्यु की संभावनायें मध्यपदेश की तुलना में साढ़े पांच गुना कम होती है।
यह सही है कि पारिवारिक खाद्य सुरक्षा को दूर किये बिना कुपोषण की स्थिति से निजात नहीं पाई जा सकती है पर यह आत्मविश्लेषण का विषय है कि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रतिबध्दताओं के अभाव में समुदाय आधारित विकास का नजरिया ही नहीं बन पाया। विकास की नीतियों से राज्य के एक खास वर्र्ग का तीव्र विकास हुआ किन्तु एक बड़े वर्ग के हाथों से आजीविका के संसाधनों का अधिकार भी छीन लिया गया। देश के भीतर का ही तुलनात्मक विश्लेषण स्थिति को अधिक स्पष्ट कर सकता है। भारत के दक्षिणी राज्यों केरल और तमिलनाडु में बच्चों के पोषण का अधिकार 1970 के दशक में एक राजनैतिक मुद्दा बना था तब से वहां एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम वास्तव में बच्चों के जीवन में एक जिम्मेदार भूमिका निभा रहा है। जबकि मध्यप्रदेश की ताजा सच्चाई यह है कि 6 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को जहां हर रोज 1200 से 1700 कैलोरी ऊर्जा का भोजन मिलना चाहिये वहां आज उन्हें 758 कैलोरी ऊर्जा का भोजन ही मिल पा रहा है। एक मायने में उन्हें हर रोज केवल एक समय का भोजन मिल रहा है। यह स्थिति आज पैदा नहीं हुई है बल्कि सालों से चली आ रही है। भरपेट भोजन न मिल पाने के कारण ही आज प्रदेश के मजदूर रोजगार योजनाओं में तय किया गया मजदूरी का लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रहे हैं जिसके कारण उन्हें 30 से 50 फीसदी मजदूरी का कम भुगतान होता है।
प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना ने सकारात्मक ढंग से गति पकड़ना शुरू कर दिया है। मध्यप्रदेश रोजगार गारण्टी परिषद इस योजना के कार्यों में आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण का काम भी जोड़ने की पहले कर देश के सामने एक उदाहरण पेश कर सकती है। सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि रोजगार गारण्टी योजना मानव विकास की परिभाषा को समुदाय के बीच क्रियान्वित करने का काम करे।
राज्य के व्यवहार से स्पष्ट होता है कि वह भूमण्डलीकरण के दौर में बच्चों की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद भी आंगनबाड़ियों के पोषण आहार की आपूर्ति में ठेकेदारों का उपयोग नहीं होगा। पोषण आहार की आपूर्ति केन्द्रीयकृत न होकर स्वयं सहायता समूह या महिला मण्डलों के जरिये होगी, मध्यप्रदेश सरकार ने यह काम ठेकेदारों को देना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं पोषण आहार की स्थानीय समुदाय आधारित विकल्पों को सम्मन देने के बजाये वे रिच एनर्जी फूड की आपूर्ति का निर्णय ले चुके हैं। सरकार मानती है कि बच्चों को ऊर्जा देने वाला पोषण आहार केवल बहुराष्ट्रीय कम्पनी ही तैयार कर सकती है। यह बहुत ही सूक्ष्म किन्तु महत्वपूर्ण बात है कि जब तक समुदाय को पता ही नहीं होगा कि उसके अधिकार क्या है। तब तक वह उनका उपयोग भी नहीं कर सकते हैं। यह बात आंगनबाड़ियों के संदर्भ में मध्यप्रदेश पर बखूबी लागू होती है। 83 फीसदी ग्रामीणों को अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि आंगनबाड़ी से किस तरह की सेवाये मिलती हैं। वे यही मानते हैं कि बच्चे सम्मानपूर्वक जियें या न जियें, पर मरने न पायें यह कोशिश होती रहना चाहिये। और जब यह कोशिश असफल हो जाती है तो समुदाय की प्रतिनिधि के तौर पर जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे कार्यकर्ताओं को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पर व्यवस्था वही रहती है गैर जवाबदेय और धरातल से दूर।
वास्तव में आने वाली पंचवर्षीय योजना में पोषण के अधिकार के संदर्भ में सरकार को दो स्तरों पर प्रतिबध्दतायें तय करने की जरूरत है। पहले स्तर पर तो यह तय करना होगा कि एकीकृत बाल विकास योजना का दर्शन बदले। सरकार को यह सिध्द करना होगा कि आज के परिदृश्य में आंगनबाड़ी केन्द्र हर बच्चे के विकास का केन्द्र बने न कि किसी खास वर्ग के बच्चों का। इसे सामाजिक-आर्थिक वर्गभेद की अवधारणा से निकालना होगा। दूसरे स्तर पर सरकार को तय करना होगा कि देश की हर बसाहट में सभी साधनों से सम्पन्न आंगनबाड़ी की स्थापना हो और यह किसी एक सरकारी विभाग का दायित्व न हो बल्कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास, स्कूल शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्त, आदिवासी विकास जैसे विभागों की स्पष्ट भूमिकायें इस योजना में तय र्हों। जहां तक आर्थिक संस्थाधनों की जरूरत का सवाल है, सरकार को अपने दस्तावेज के पहले वाक्य में यह कहना चाहिये कि इस योजना के लिये किसी भी तरह का आर्थिक संकट नहीं आने दिया जायेगा। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से जिस तरह के काम की अपेक्षा की जाती है उसके अनुरूप न तो उसे मानदेय दिया जाता है न ही सम्मान और न ही प्रशिक्षण। वह जनगणना का भी सर्वे कर रही है और शिक्षा का भी एक तरह से वह शोषितों की नई जमात का रूप ले रही है। कुपोषण और स्वास्थ्य के संदर्भ में उनकी भूमिका के संदर्भ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को एक सरकारी बाबू के बजाये रचनात्म्क कार्यकर्ता की भूमिका निभाने का अवसर दिया जाना चाहिये।
वर्तमान परिस्थितियों में कुपोषण मिटाने के लिये हो रहे प्रयासों में व्यापक नीतिगत बदलाव करने की जरूरत है :-
उद्देश्यों से भटकाव रोकने की कोशिश
बच्चों में कुपोषण की दर्दनाक समस्या को समाप्त करने के लिये एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम एक व्यापक प्रयास है। शून्य से छह वर्ष तक के बच्चों के जीवन को सुरक्षित रखकर ही विकास की प्रक्रिया को सकारात्मक संदर्भों में आगे बढ़ाया जा सकता है। आईसीडीएक योजना में पोषण आहार कार्यक्रम सबसे अहम् स्थान रखता है किन्तु इसी हिस्से को सबसे ज्यादा नजरअंदाज भी किया गया है। विश्लेषण करने पर हम पाते है। कि अब तक 6 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को एक सामान्य वर्ग के रूप में ही देखा गया है जबकि वास्तव में छह माह से दो वर्ष तक के बच्चों के लिये ज्यादा सघन और संवेदनशील कार्ययोजना बनाये जाने की जरूरत थी। शुरू के छह माह तक तो एक हद तक बच्चे पोषण सम्बन्धी जरूरतें मां के दूध से पूर्ण होती है। अत: उस स्थिति में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के पोषण पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं हुआ और यही कारण है कि प्रदेश में शिशु मृत्यु दर में उल्लखनीय कमी नहीं आई। इसके बाद छह माह से दो वर्ष की आयु में जब शरीर और मस्तिष्क (दिमाग) के सबसे अहम् हिस्सों का सबसे तेज विकास होता है तब सूक्ष्म पोषणीय तत्वों (Micro- Nutriant) की जरूरत पर ध्यान नहीं दिया गया। इस वर्ग के बच्चों को भी सामान्य (पचाने में कठिन) पोषण आहार ही उपलब्ध कराया जाता रहा है जिससे बच्चों पर प्रयास का सार्थक प्रभाव नहीं पड़ा है।
वहीं आग्र चलते हुये हमें यह देखना जरूरी है कि 2 वर्ष से 6 वर्ष तक के बच्चों के प्रति समाज और परिवार को सचेत रहने की जरूरत होती है किन्तु आईसीडीएस के अन्तर्गत परिवार की पोषण सम्बन्धी शिक्षा एक बहुत ही औपचारिक हिस्सा बनकर रह गई। जमीनी विश्लेषण यह सिध्द करते हैं कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की क्षमतावृध्दि के लिये होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपेक्षा की गई है। इसी कारण हितग्राहियों के घर-घर जाकर होने वोला पोषण और स्वास्थ्य सम्बन्धी संवाद ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। मध्यप्रदेश में पोषण के अधिकार और एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के संदर्भ में हुये संघर्ष की सीख से पता चलता है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता राज्य सरकार के भीषण दबाव में काम कर रही है। अब चूंकि कुपोषण को भुखमरी का एक रूप माना जाने लगा है इसलिये अफसरशाही और मध्यमस्तर पर कार्य कर रहे अधिकारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पर कुपोषित बच्चों के नाम एवं संख्या रजिस्टर में दर्ज न करने के लिये दबाव डालने है। खासतौर पर रणनीति यह रही है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को तीसरे एवं चौथे ग्रेड के कुपोषित बच्चों की जानकारी अधिकृत रूप से दर्ज न करने दिया जाये। सरकार की मान्यता है कि पहले और दूसरे दर्जे का कुपोषण बहुत गंभीर मुद्दा नहीं है। यही कारण है कि वास्तविकता में अब पहले और दूसरे ग्रेड के बच्चे भी तीसरे-चौथे ग्रेड के कुपोषण में प्रवेष कर रहे हैं।
योजना तक बच्चों की पहुंच
अब तक सामान्य इलाकों में एक हजार की जनसंख पर और आदिवासी इलाकों में 700 की जनसंख पर और आंगनबाड़ी की स्थापना का प्रावधान सरकार के स्तर पर रहा है। किन्तु अब आंगनबाड़ी की स्थापनरा के मानकों के संदर्भ में नये सुझाव आये हैं :-
1 500 से 1500 की जनसंख्या - 1 आंगनबाड़ी (सामान्य क्षेत्र)
2 150 से 500 की जनसंख्या - 1 छोटी आंगनबाड़ी
आदिवासी इलाकों के लिये सुझाव
1 300 से 1500 की जनसंख्या - 1 आंगनबाड़ी
2 150 से 300 की जनसंख्या - 1 छोटी आंगनबाड़ी
शहरी इलाकों के लिये सुझाव
1 500 से 1500 की जनसंख्या- 1 आंगनबाड़ी
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे और ज्यादा स्पष्ट करते हुये कहा है कि हर बसाहट में आंगनबाड़ी केन्द्र की स्थापना की जाना चाहिये। इस हिसाब से मध्यप्रदेश में 1.32 लाख आंगनबाड़ियों की जरूरत होगी। आंगनबाड़ी गांव के किस हिस्सो में स्थापित हुई है, इससे भी बच्चों की पहुंच का मुद्दा जुड़ा हुआ है। छतरपुर के जटाशंकर बड़ागांव में आंगनबाड़ी तो है परन्तु उच्च जाति बहुल इलाके में है जहां दलित बच्चों का प्रवेश संभव नहीं हो पाता है। यह सुनिश्चित करना होगा कि सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव का दायित्व हाथ में लिया जाये।
पोषण आहार की गुणवत्ता
प्रयास कुपोषण की समाप्ति के लिये हो रहे हैं किन्तु यदि पोषण आहार में ही यदि कीटाणु और फफूंद हो तो स्थिति क्या होगी यह कल्पना आसानी से की जा सकती है। मध्यप्रदेश के खण्डवा जिले में 175 आंगनबाड़ियों में फफूंद युक्त दलिया वितरित किया गया। इसी तरह चूंकि 75 फीसदी आंगनबाड़ियाँ चूंकि कच्चे मकानों में स्थापित है इसलिये वहां स्टोर किये गये पोषण आहार की गुणवत्ता को बनाये रख पाना अत्यंत कठिन विषय है। ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि हर आंगनबाड़ी का पक्का भव हो और पोषण आहार के भण्डारण की उपयुक्त व्यवस्था की जा सके। साथ ही मध्यप्रदेश में महालेखाकार ने भी अपनी रिपोर्ट में पोषण आहार की पौष्टिकता पर सवाल खड़े किये यह रिपोर्ट बताती है कि पोषण आहार में जिस अनुपात में मूंगदाल, गुड़ और नमक का उपयोग होना चाहिये उतनी मात्रा में इन सामग्रियों का उपयोग पोषण आहार में नहीं हुआ है। इसका मतलब है कि बच्चों को निर्धारित मात्रा में कैलोरी, प्रोटीन, वसा और कार्बोहाईड्रेट नहीं मिल रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से आई सी डीएस कार्यक्रम के असफल होने के संकेत है।
सहभागिता का अभाव
समुदाय के लिये संचालित की जा रही इस योजना में पंचायतों और समुदाय की भूमिका व्यावहारिक रूप से किसी भी स्तर पर सुनिश्चित नहीं की गई है। आश्चर्यजनक है कि पंचायतों की भूमिका इस कार्यक्रम के संदर्भ में नगण्य है इसलिये आंगनबाड़ी के बंद होने पर भी वह कोई कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। इसके बाद पंचायतों ने अपने अनुभव में यही पाया है कि चूंकि कहीं सरकार नकी भी प्रतिबध्दता नहीं है इसलिये वे भी इस योजना से बहुत आशायें नहीं रखते हैं। वे देखते रहे हैं कि ज्यादातर दिन पोषण आहार ही नहीं आता है, गलत तरीके से वनज लिया जाता है, स्वास्थ्य जांच बेहद आनियमित तरीके से होती है तो ऐसे में ज्यादा माथा-पच्ची करने का कोई मतलब नहीं है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर बोझ
समुदाय कार्यकर्ता स्थानीय और वंचित समुदाय से चुनने की कोशिश की जाती है। चूंकि उनका काम सामाजिक-मनोविज्ञान से ज्यादा जुड़ा हुआ है फिर भी उनके प्रशिक्षण और क्षमतावृध्दि कार्यक्रमों पर से सरकार का ध्यान कम होता जा रहा है। उसके मानदेय के भुगतान में अनियमितता होती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता जदातर अवसरों पर विभाग की ऊपरी संरचना (विभाग का संचालनालय और राज्य सरकार) के नीतिगत निर्णयों से प्रभावित होती है, भ्रष्टाचार का प्रभाव उसके यहां पोषण आहार की आपूर्ति पर सीधा पड़ता है परन्तु समुदाय के गुस्सें का सामाना भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को ही करना पड़ता है। इसके अलावा उसे मात्र 1000 रूपये का मानदेय दिया जाता है जरूरत इस बात की है कि उसका नियमितिकरण करके सम्मान जनक मानदेय की व्यवस्था की की जाना चाहिये। काम की सघनता और संवेदनशीलता को देखते हुये छह माह से तीन वर्ष तक के बच्चों और तीन वर्ष से छह वर्ष तक के बच्चों की देखभाल के लिये कम से कम दो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की व्यवस्था की जाना चाहिये। आमतोर पर एक आंगनबाड़ी में 80 से 100 बच्चे पंजीकृत किये जाते है क्या यह संभव है कि इतने छोटे बच्चों को इतनी संख में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संभाल सकती है। यदि नहीं तो फिर इस कार्यक्रम के कोई मायने नहीं है क्योंकि हमारे यहां यही होता है।
वैश्विकीकरण के समर्थक नीति निर्माताओं को यह जान लेना होगा कि कुपोषण से मुक्ति के लिये किया गया व्यय कोई रियायत (Subsidy) नहीं बल्कि बेहतर विकास के लिये किया गया निवेश है।
Sachin Kumar Jain |