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  शिक्षा की चुनौती: जरा स्कूल चलें हम  
     
 

चुनावी मुद्दों में शिक्षा का मसला उतना ही पिछडा नजर आ रहा है जितना मध्यप्रदेश इस मसले पर अन्य रायों की तुलना में पिछड़ा है। तीसवें स्थान पर खडे प्रदेश की स्थिति के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति को जिम्मेदार माना जाता है। संविधान में शिक्षा के लिए रायों को जवाबदार बनाया है, लेकिन रायों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया है उसका नमूना सामने है। प्राथमिक शिक्षा अब उस राजनीतिक दल के लिए चुनौती होगी जो विधानसभा चुनाव के बाद सरकार का गठन करेगा। शिक्षा के मौजूदा हालात जहां प्रदेश को सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य हासिल करने में मुश्किलें पेश करेंगे। वर्ष 2015 तक प्रदेश के सभी बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा सुनिश्चित करवाना है। मगर प्रदेश के लाखों बच्चों के नसीब में शिक्षा की लकीर नजर नहीं आती है। तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूल छोड़ चुके ढाई लाख बच्चों को दोबारा स्कूल पहुंचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। डाइस की रिपोर्ट के आंकड़े खुद ब खुद इसकी हकीकत बयां करते हैं। चौंकाने वाले तथ्य तो यह हैं कि वर्ष 2000-01 में स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों में से सिर्फ दस फीसदी ही स्कूल छोडक़र जाते थे जबकि वर्ष 2006 तक स्कूल छोडने वाले बच्चों का प्रतिशत 20 के करीब पहुंच गया। जनशिक्षा अधिनियम के बावजूद मुफ्त प्राथमिक शिक्षा सपना बनी हुई है। शिक्षा को लेकर हमेशा ही सरकारी आंकड़े यूनीसेफ जैसे संगठनों संस्थाओं की सर्वे रिपोर्ट के आगे दम तोड़ देते हैं। तभी तो शिक्षा विभाग के वार्षिक प्रतिवेदन में नामांकन अनुपात 99 प्रतिशत की हकीकत जानने मध्यप्रदेश शिक्षा अभियान ने दस जिलों में सर्वे कराया तो यह 84 प्रतिशत पर जाकर ठहर गया। इसमें से दस प्रतिशत बच्चों को बाहर माना जाए तो उनमें दलित, आदिवासी समुदाय के ही होंगे। इनमें भी लड़कियों की संख्या अधिक होगी।

दरअसल, यह उन दावों की हकीकत है जो अब तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज सरकारों ने किए हैं। सीधी सी बात है प्रदेश के गठन के 52 साल बाद भी शतप्रतिशत बच्चों को स्कूल तक लाने की कवायद ही चल रही है। बच्चे किसी भी राजनीतिक दल के वोट बैंक नहीं हैं। चुनावी घोषणा पत्रों में अपनी जगह टटोलते इन बच्चों की उम्मीद पर अब तक कोई दल खरा नहीं उतरा है। ऐसे में घोषणा पत्रों में प्राथमिक शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिलना लाजिमी है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने की बात होती है और विकास के सोपान तय करने के अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जब लाखों बच्चों तक शिक्षा की रोशनी ही नहीं पहुंचेगी तो यह सारे लक्ष्य चुनौती ही बने रहेंगे। मध्यप्रदेश में अब तक सिर्फ दो दल कांग्रेस और भाजपा ही सरकार बनाते रहे हैं। स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आने वाले इन दलों के सामने कभी अस्थिरता का संकट नहीं रहा जिसके नाम पर शिक्षा सरीखे मुद्दों की अनदेखी की बात कह सकें। सरकार बदलती है और शिक्षा अभियानों का नाम बदल जाता है। इन सब के बीच बच्चों की शिक्षा का सवाल जस का तस बना रहता है।

जाहिर है मामला सीधे तौर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का है जिसकी कमी का खामियाजा प्रदेश के लाखों बच्चों को उठाना पड़ रहा है। राजनीतिक दल अगर देख पाएं तो मालूम हो जाएगा कि मासूम बच्चों की टकटकी में उनके शिक्षा के हक का सवाल छुपा हुआ है।

शिक्षा से जुड़े अहम सवाल...

बाल मजदूरी - प्रदेश में बाल मजदूरों के लिए दो बड़ी योजनाएं चल रही हैं। नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 17 जिलों में 59012 बाल मजदूर हैं जिनमें से सिर्फ 19072 ही स्कूल जा रहे हैं। इसी तरह इंडस योजना के तहत 5 जिलों के 73119 बाल मजदूरों में से मात्र 28184 को स्कूल में नामांकित बताया जा रहा है। इनके हक में किए जा रहे प्रयासों की पोल खोलने के लिए बैतूल  का उदाहरण काफी है जहां 5000 से यादा बाल मजदूर होने पर भी इनके लिए कोई ब्रिज स्कूल आज तक नहीं खुला है।

विस्थापन - विस्थापन की वजह से स्कूल छोड़ने को मजबूर बच्चों के संबंध में कोई आंकड़े नहीं हैं। न तो इसके लिए प्रयास हुए और ना ही इनके लिए कोई योजना तैयार की गई। नर्मदा घाटी के विस्थापित परिवारों के हजारों बच्चे हों या पालपुर कूनो के विस्थापित 27 गांवों के बच्चे, सबकी निगाहें आने वाली सरकार पर हैं जो उन्हें स्कूल की सूरत दिखाएगी।

भेदभाव - आजादी के छह दशकों बाद भी प्रदेश के स्कूलों से भेदभाव की बुराई नहीं मिट सकी है। होशंगाबाद के पास रानीपिपरिया के सपेरा समुदाय के किसी भी बच्चे को स्कूल में दाखिला नहीं दिया जाता है। सागर के पथरिया गांव की बेड़नी समुदाय की लड़क़ियों को स्कूल में इसलिए अपमानित होना पड़ता है क्योंकि उनके समुदाय की महिलाएं वेश्यावृत्ति करती हैं। पारदी समुदाय को समाज ने अपराधी मान लिया है। इनके बच्चों को स्कूल में ही अपराधी होने का बोध कराया जाता है।

कुपोषण - आंगनबाड़ी केंद्रों से लेकर स्कूलों तक बच्चों के लिए पोषण आहार की व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद पूरे प्रदेश में कुपोषण की जो भयावह तस्वीर सामने आई उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के एक सवाल खड़ा कर दिया है कि करोड़ों रुपए का पोषण आहार कौन खा गया?

आंकड़े:

  • प्रदेश की लगभग दो प्रतिशत स्कूलों में तो शिक्षक ही नही है।
  • प्रदेश की 32 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों में एक ही शिक्षक है।
  • पांच प्रतिशत से यादा स्कूल ऐसे हैं जहां सौ बच्चों पर केवल एक शिक्षक है।
  • करीब 47 प्रतिशत शिक्षक तो अप्रशिक्षित हैं।

नितिन त्रिपाठी

 
     
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