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बच्चों के लिए साल के दो महीने बहुत ही खुशियों भरा होता है, जब वे वार्षिक परीक्षा से मुक्त होकर स्कूल, पढ़ाई, होमवर्क की चिंता छोड़ खेलने, घुमने और मस्ती करने में लग जाते हैं। दो माह तक शाला से मुक्ति वाले दिन उन्हें साल के सबसे अच्छे दिन लगते हैं। शाला जाने वाले बच्चों में से अधिकांश यही सोचते हैं कि काश कल शाला बंद हो। पर ऐसा संभव नहीं है और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शाला एक अनिवार्य अंग है। पर क्या शाला इतना भयभीत कर देने वाली या बोरियत वाली स्थान है, जो बच्चों के लिए पसंदीदा जगह नहीं बन सकती? या फिर क्या बच्चे पढ़ना ही नहीं चाहते? वास्तव में इन दोनों का जवाब है कि शाला बच्चों के लिए पसंदीदा स्थान बन सकती है और बच्चे पढ़ना चाहते हैं और खूब पढ़ना चाहते हैं।
तमाम अव्यवस्थाओं - शौचालय की कमी, कमरे की कमी, टीएलएम की कमी, कौशल से युक्त शिक्षक की कमी, पानी की कमी - के बावजूद बच्चे शाला जाते हैं और पढ़ना चाहते हैं, पर शाला का नीरस वातावरण और शिक्षकों की उपेक्षा बच्चों में शिक्षा के प्रति उत्साह को कम कर देती है, जिसकी वजह से बच्चों के लिए शाला जाना सजा से कम नहीं लगता। संसाधनों की कमी एक समस्या है, पर सबसे बड़ी समस्या शालाओं में दी जाने वाली शारीरिक दंड है। यह एक ऐसा भय है, जिसके कारण या तो बच्चा बीच में पढ़ाई छोड़ देता है या फिर वह अपनी पूर्ण क्षमताओं के साथ पढ़ाई नहीं कर पाता और मानसिक तनाव में सीखने की प्रक्रिया में वह लगातार पिछड़ता चला जाता है। शिक्षा व्यवस्था में यह एक ऐसी समस्या है, जो गांव की सुविधाहीन शाला से लेकर महंगे पब्लिक स्कूल में भी व्याप्त है। भारत में यह समस्या पारंपरिक रूप से है और शिक्षकों का मानना है कि बिना दंड के बच्चे अनुशासन में कैसे रहेंगे। उन्हें बच्चों को अनुशासन में रखने की कोई दूसरी विधि आती ही नहीं। पर कई अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि बच्चों को शारीरिक दंड देने से उनके मानसिक क्षमताओं पर गहरा आघात पहुंचता है, जिससे वे ताउम्र बाहर नहीं आ पाते और उच्च शिक्षा तक पहुंचने की क्षमता खो देते हैं।
यूनिसेफ के अनुसार, ''किसी भी तरीके की हिंसा, दर्ुव्यवहार या शारीरिक सजा बच्चों के अधिकारों का हनन है और इस तरह के व्यवहार से मुक्ति बच्चों का अधिकार है।'' बाल अधिकार समझौता पर भारत ने हस्ताक्षर किया है और उसमें भी बच्चों पर किसी भी तरह की हिंसा को बच्चों के स्वाभिमान पर ठेस पहुंचाने वाला माना गया है। पर इसके बावजूद भारत में 65 फीसदी शालाओं में दंड के शिकार होते हैं। शालाओं में बच्चों को दंडित करने के लिए कई प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं जिसमें उन्हें मारना, कक्षा में खड़े रखना, प्रार्थना सभा में शर्मिंदा करना, धूप मे खड़ा करना, कपड़े उतरवाना, मुर्गा बनाना या सवाल का जवाब देने वाले बच्चे से जवाब नहीं देने वाले बच्चों को पिटवाना आदि सामान्य है। इसका सीधा असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है। शिक्षा व्यवस्था में दंड बच्चों के शिक्षा के अधिकार का हनन् करता है और वे बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं। कई बार उनका मन:स्थिति पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि वे आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने के लिए विवश हो जाते हैं। शिक्षा में शारीरिक और मानसिक दंड के इन बढ़ते घटनाक्रम के पीछे हमारे संवैधानिक प्रावधानों में छिपी विसंगतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जैसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323 के अनुसार - किसी को भी दी गई शारीरिक और मानसिक पीड़ा अपराध है, किन्तु बच्चाें पर की गई चोट इसमें शामिल नहीं है। इसी प्रकार अनुच्छेद 88 और 89 के अनुसार उन सभी व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करती है जो बच्चों की किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुंचाता है यदि वह बच्चे के हित मे हो। स्कूलों में दंड को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एन.सी.पी.सी.आर) ने अगस्त 2007 में और पुन: 26 मई 2009 में सभी राज्य हेतु दिशा-निर्देश जारी किए, पर कई राज्यों द्वारा इन दिशा-निर्देशों को अनदेखी करते हुए कोई कार्यवाही नहीं की गई, जिसके भयानक परिणाम हमारे सामने आते रहते हैं।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के एक स्कूल में चार वर्षीय इरफान को छुट्टी के बाद स्कूल में अकेले में 2 घंटे रोककर रखा गया क्योंकि उनके माता-पिता ने स्कूल बैग के 100 रुपए जमा नहीं किये थे। मध्यप्रदेश के ही देवास जिले की दसवीं की छात्रा शीला पर अपना 'प्रोजेक्ट' पूरा करने के लिए शिक्षक द्वारा इस प्रकार दबाव बनाया गया कि पिछले वर्ष उसे आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। दलित आदिवासी क्षेत्रों में शारीरिक दंड के विभिन्न रूप अपनाए जाते हैं। इसका एक वीभत्स रूप बालाघाट जिले के कटंगी ब्लॉक में पाया गया जहां सरकारी प्राथमिक शाला में 143 आदिवासी और दलित छात्र-छात्राओं में नियमानुसार शाला के शौचालय की सफाई करना आवश्यक है। यदि कोई बच्चा ऐसा करने से मना करता है या उस दिन स्कूल नहीं आता है तो वह शिक्षक द्वारा दी गई यातनाओं का शिकार होता है।
इसी साल 1 अप्रैल से लागू बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 (1) में कहा गया है कि बच्चों को किसी भी तरह से शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न नहीं दिया जाएगा। धारा 17 (2) में यह कहा गया है कि धारा 17 (1) के उल्लंघन करने पर सेवा नियमों के तहत उस व्यक्ति पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में इस प्रावधान की जरूरत शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त एक ऐतिहासिक समस्या से निजात पाने का प्रयास है। अत: जब देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो गया है तो बच्चों को स्कूली व्यवस्था से दंड से दूर रखना भी नितांत आवश्यक हो गया है ताकि वे शाला त्यागी न बने और शिक्षा के अधिकार को पा सकें। स्कूली व्यवस्था में दंड पर पूर्ण प्रतिबंध करने के लिए नियमों का कठोर क्रियान्वयन आवश्यक है। आवश्यक है कि शिक्षकों को वैज्ञानिक रीति से शिक्षण कौशल द्वारा प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे साकारात्मक व्यवहार से बच्चों में स्व-अनुशासनात्मक भावनाओं को जाग्रत कर सकें। साथ ही बच्चों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल कर उन्हें उचित स्थान देना भी दंड को रोक लगाने के लिए हितकर साबित होगा। साथ ही शिक्षा व्यवस्था को थोड़ा, सरल, तनाव मुक्त बनाना होगा। बच्चे अति ऊर्जावान होते हैं अत: उनकी ऊर्जा को सृजनात्मक गतिविधियों में उपयोग कर उनकी शैतानी पर एक अंकुश लगाया जा सकता है ताकि शारीरिक दंड को विराम दिया जा सके।
सीमा जैन |
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