बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 (1) में कहा गया है कि बच्चों को किसी भी तरह से शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न नहीं दिया जाएगा. धारा 17 (2) में यह कहा गया है कि धारा 17 (1) के उल्लंघन करने पर सेवा नियमों के तहत उस व्यक्ति पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में इस प्रावधान की जरूरत शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त एक ऐतिहासिक समस्या से निजात पाने का प्रयास है. भारतीय परंपरा में विद्यार्थी जीवन एक कठिन एवं श्रमसाध्य कार्य माना जाता था. पर इसमें धीरे-धीरे इसमें कुछ ऐसी खामियां भी आ गई, जो शिक्षा व्यवस्था में सबसे बुरी खामियों से एक है - वह है छोटी-छोटी गलतियों पर भी शारीरिक एवं मानसिक दंड देना. बाद में इसे औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए लोकोक्तियां भी गढ़ ली गई, जिसमें एक सबसे ज्यादा मशहूर है - गुरूजी मारे धम-धम, विद्या आवे छम-छम. पर कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि शिक्षा व्यवस्था में शारीरिक दंड एक क्रूर सजा है, जिसके कारण बच्चों के मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, और यह बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने का सबसे बड़ा कारण है. इस समस्या से निजात पाने के लिए हाल ही में कुछ प्रावधान किए गए, पर उनमें से कोई भी प्रभावी नहीं हो पाया.
हाल में आए कुछ मामलों में बच्चों के हाथ टूट गए हैं, बच्चों की मौत हो गई है और कई बच्चों को लंबा इलाज कराना पड़ा है. भोपाल के एक स्कूल में छ: वर्षीय अनमोल को उसकी शिक्षिका ने इतना मारा उसके हाथ की हड्डी खिसक गई और उसे ऑपरेशन की पीड़ा झेलनी पड़ी। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अंग्रेजी का एक अक्षर गलत बताया था। वहीं सागर के एक स्कूल में पढ़ने वाली पांचवी कक्षा की छात्रा प्रेमलता द्वारा किसी प्रश्न का गलत जवाब देने पर मास्टर जी को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया और अंतत: इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. स्कूल प्रबंधन ऐसे मामले को छिपाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं. स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड नहीं मिल पाए, इसके लिए स्कूल शिक्षा विभाग भी कोई कारगर कदम उठाने का प्रयास नहीं कर रहा है.
न जाने कितने ऐसे अनमोल और प्र्रेमलता रोज विद्यालय में चुपचाप सजा भुगतने के लिए मजबूर हैं. शिक्षा व्यवस्था में मानसिक और शारीरिक दंड बहुत ही आम बात होती जा रही है. वर्तमान शिक्षा पध्दति में भी शिक्षा के वैज्ञानिक पहलुओं को गौण मानकर, विद्यालय में अनुशासन बनाए रखने के लिए छात्र-छात्राओं को दंडित करना एक नायाब नुस्खे की तरह शामिल किया जा रहा है, और दंड भी ऐसा जो सभी मानवीय संवेदनाओं से परे हैं. अनमोल और प्रेमलता यदि कक्षा में सही जवाब नहीं दे पाते या उन्हें लिखना नहीं आता तो क्या केवल वे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार हैं? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था या शिक्षकों में शिक्षण कौशल की कमी इसके लिए उत्तरदायी नहीं है?
विद्यालय में बच्चों को दंडित करने के लिए नाना प्रकार के तरीके अपनाए जाते हैं जिसमें उन्हें मारना, कक्षा में खड़े रखना, प्रार्थना सभा में शर्मिंदा करना, धूप मे खड़ा करना आदि सामान्य है. इसका सीधा असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है. शिक्षा व्यवस्था में दंड बच्चों के शिक्षा के अधिकार का हनन् करता है और वे बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं. कई बार उनका मन:स्थिति पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि वे आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने के लिए विवश हो जाते हैं या फिर उनका मानसिक विकास अवरूध्द हो जाता है. शिक्षा में शारीरिक और मानसिक दंड के इन बढ़ते घटनाक्रम के पीछे हमारे संवैधानिक प्रावधानों में छिपी विसंगतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जैसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323 के अनुसार - किसी को भी दी गई शारीरिक और मानसिक पीड़ा अपराध है, किन्तु बच्चाें पर की गई चोट इसमें शामिल नहीं है. इसी प्रकार अनुच्छेद 88 और 89 के अनुसार उन सभी व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करती है जो बच्चों की किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुंचाता है यदि वह बच्चे के हित मे हो. इस प्रकार के संवैधानिक प्रावधान बच्चों को दिए जा रहे शारीरिक और मानसिक दंड को वैध करार देते हैं.
इसके चलते भारत में 65 प्रतिषत छात्र-छात्राएं स्कूली व्यवस्था मेेंं दंड का शिकार होते हैं. मध्यप्रदेश में गठन के वर्षों के बाद भी इस तरह के बाल अत्याचार को रोकने के लिए कोई ठोस नियम नहीं अपनाएं गए जिसके द्वारा बच्चों को एक अनुकूल माहौल में शिक्षा दी जा सके. स्कूलों में दंड को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एन.सी.पी.सी.आर) ने अगस्त 2007 में और पुन: 26 मई 2009 में सभी राज्य हेतु दिशा-निर्देश जारी किए, पर मध्यप्रदेश शासन द्वारा इन दिशा-निर्देशों को अनदेखा करते हुए कोई कार्यवाही नहीं की गई. जिसके भयानक परिणाम हमारे सामने आते रहते हैं.
अत: आज जब 1 अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो गया है तो बच्चों को स्कूली व्यवस्था से दंड से दूर रखना भी नितांत आवश्यक हो गया है ताकि वे शाला त्यागी न बने और शिक्षा के अधिकार को पा सकें. स्कूली व्यवस्था में दंड पर पूर्ण प्रतिबंध करने के लिए नियमों का कठोर क्रियान्वयन आवष्यक है. आवश्यक है कि शिक्षकों को वैज्ञानिक रीति से शिक्षण कौशल द्वारा प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे साकारात्मक व्यवहार से बच्चों में स्व-अनुशासनात्मक भावनाओं को जाग्रत कर सकें. साथ ही बच्चों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल कर उन्हें उचित स्थान देना भी दंड को रोक लगाने के लिए हितकर साबित होगा.
सीमा जैन
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