संविधान के 86 वे संशोधन अधिनियम के बाद से 6-14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए प्रारम्भिक शिक्षा मौलिक अधिकार बन गई। इसके तुरन्त बाद ही मध्यप्रदेश में म.प्र. जन शिक्षा अधिनियम 2002 लागू किया गया। मध्यप्रदेश ने इस मामले मेें देश के अन्य राज्यों से बाजी मार ली। यह भी आशा व्यक्त की गई कि मध्यप्रदेश में बच्चों को न केवल अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी बल्कि उपलब्ध कराई जाने वाली शिक्षा गुणवत्तापूर्ण होगी। 2002 में ही जन शिक्षा नियम के अनुसार प्राथमिक एवं मध्य स्तर की शालाओं के संचालन एवं व्यवस्था के लिए पालक शिक्षक संघ (पीटीए) के गठन का प्रावधान किया गया। यह एक क्रान्तिकारी कदम था, जिसमें स्थानीय समुदाय को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की कवायद की गई। पीटीए को कई अधिकारों एवंर् कत्तव्यों से लैस किया गया, जिसमें एक प्रकार से स्थानीय शिक्षा को पालकों के जिम्मे ही कर दिया गया। यानी बच्चों के नामांकन, उनका शाला में ठहराव, शाला का निर्माण, शाला का संचालन, शाला काश की देखरेख, शाला का निर्माण आदि कार्यों के लिए पीटीए को ही उत्तरदायी माना गया।
पीटीए के अध्यक्ष के लिए निर्वाचन का प्रावधान रखा गया, जो कि उस शाला में पढ़ने वाले किसी बच्चे के माता-पिता में से कोई हो सकता है और सचिव पद पर प्राधानाध्यापक को मनोनित माना गया। चूंकि शाला कोश की जिम्मेदारी पीटीए को दी गई है, इस वजह से पीटीए के निर्वाचन को लेकर कई विसंगतियां सामने आई। कई शिकायतों के बाद सरकार ने नियमों में संशोधन कर मेरिट वाले बच्चे के माता या पिता को अध्यक्ष बनाये जाने का प्रावधान किया गया। पीटीए का गठन हो जाने के बावजूद यह पूरी तरह से फंक्शन में नहीं आ पाया। अध्यक्ष को भी सिर्फ शाला कोष से मतलब था। पीटीए के कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को इसके बारे में जानकारी भी नहीं होती है। इसलिए शासन स्तर पर पीटीए को प्रशिक्षण देकर उत्तरदायी और सशक्त बनाया जाने लगा।
पीटीए के प्रशिक्षण में भी यह देखा गया कि उन्हेंर् कत्तव्यों के बारे में बताने पर ज्यादा जोर दिया गया पर अधिकारों की बात पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई। इसके बावजूद यह देखा गया कि प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सक्रिय संस्थाओं एवं संगठनों के प्रयासों से कई स्थानों पर पीटीए सक्रिय भूमिका में आ गया। साथ ही कई जगहों पर पीटीए अध्यक्ष एवं शिक्षक भी अपने स्तर परशाला में सुधार एवं गुण्ावत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास कर लगे। एक ओर सरकार बार-बार यह कहती रही है कि स्थानीय स्तर पर पीटीए की कमजोर भूमिका के कारण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है और शाला का प्रबंधन बेहतर नहीं है पर दूसरी ओर यह साफ दिख रहा है कि जहां कहीं भी पीटीए सक्रिय है, उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। पीटीए के लाख प्रयत्नों के बाद भी न तो सरकार के कान पर जूं रेंग रही है ओैर न ही पीटीए के प्रस्तावों को महत्व दिया जा रहा है।
इस सिलसिले में हाल ही में एक दु:खद घटना से हम रू-ब-रू हुए हैं। मध्यप्रदेश के सागर में किराए के दो कमरों में 20 वर्षों से संचालित गणेश मंदिर शासकीय प्राथमिक शाला के लिए भवन की मांग को लेकर सक्रिय पालक शिक्षक संघ (पीटीए) के अध्यक्ष शिवकुमार चौधरी ने प्रशासनिक उपेक्षा के चलते आत्मदाह कर अपनी जान गवां दी। पीटीए अध्यक्ष ने सिर्फ एक सपना देखा था कि शाला का अपना भवन हो, जहां बच्चों को अलग-अलग कक्षाओं में बैठाकर उन्हें बेहतर तरीक से पढ़ाया जा सके, पर सपने को साकार नहीं कर पाने के कारण पीटीए अध्यक्ष को इस कदर निराश होना पड़ा कि उसे आत्मदाह की घोषणा करनी पड़ी और उसने आत्मदाह कर लिया। प्रशासनिक अधिकारियों को लगभग डेढ़ माह पहले से इस बात की जानकारी थी, इसके बावजूद आत्मदाह को रोकने में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।
इस घटना को सामान्य रूप में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि मध्यप्रदेश उन अग्रणी राज्यों में शुमार है, जिसे प्रारंभिक शिक्षा में बेहतर कार्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। जन शिक्षा अधिनियम लागू करने में भी प्रदेश अव्वल रहा है। जब यह कहा जाता है कि स्थानीय स्तर पर शाला संचालन का दायित्व पीटीए को ही है और प्रदेश में पीटीए को सक्रिय करने के लिए शासन स्तर पर पीटीए सदस्यों को प्रशिक्षित भी किया गया है, तो फिर एक सक्रिय पीटीए अध्यक्ष को क्यों यह कदम उठाना पड़ा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा पाने में नाकाम होने पर सरकार सामान्य तौर पर पीटीए की निष्क्रियता को ही जिम्मदार ठहराती है। पर जब एक पीटीए अध्यक्ष अपने अधिकारों के लिए सक्रिय होता है, तो उसको कितना महत्व दिया जाता है इसकी बानगी इस घटना में साफ दिखाई पड़ती है।
उक्त पीटीए अध्यक्ष को शाला भवन की मांग के लिए अपनी जान देनी पड़ी पर आश्चर्य की बात तो यह है कि 2007 के बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण में इस बात का जिक्र था कि ''प्रदेश की सभी 81 हजार 335 प्राथमिक शालाओं को भवन उपलब्ध करा दिए गए हैं। वर्ष 2006-07 मे 2 हजार 284 शालाओं के लिए भवन स्वीकृत होने के पश्चात् कोई भी शासकीय शाला भवनविहीन नहीं हैं।'' इस वक्तव्य के बाद भी देखने में यह आ रहा है कि प्रदेश में कई प्राथमिक शालाएं भवनविहीन हैं। डाइस रिपोर्ट (2007 में जारी) के मुताबिक 6239 प्राथमिक शालाएं भवनविहीन हैं। इस रिपोर्ट में 2006 तक के आंकड़ें हैं पर सभी प्राथमिक शालाओं को अभी भी भवन उपलब्ध नही कराया जा सका है, जैसा कि सरकार का दावा है। प्रदेश में अभी भी सैकड़ों प्राथमिक शालाएं भवनविहीन हैं।
भवनविहीन शालाओं में पढ़ाई का स्तर कैसा हो सकता है, इसे 1986 से ही किराये के दो कमरे मे संचालित गणेश मंदिर शासकीय प्राथमिक शाला की स्थिति को देखकर समझा जा सकता है। जगह कम होने से शाला को दो पालियों में संचालित किया जा रहा था। शाला में 180 बच्चे हैं, जिसमें से 156 बच्चे अनुसूचित जाति के हैं। एक साथ इतने बच्चों को पढ़ाना किस तरह से संभव है, और एक साल पहले जब शिवकुमार ने पीटीए अध्यक्ष की जिम्मेदारी सम्हाली, तब सबसे पहला संकल्प उन्होंने शाला भवन बनवाने का लिया। उन्होंने इसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों से लगातार संपर्क किया पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। शिक्षा विभाग ने जगह की अनुपलब्धता बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की।
इन परिस्थितियों में शालाओं के बेहतर प्रबंधन के लिए पीटीए को कितना तरजीह दिया जा रहा है, वह साफतौर पर दिखाई पड़ रहा है। इससे यह जाहिर हो रहा है कि सरकारी शालाओं में पढ़न वालों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रति प्रदेश में प्रशासनिक उपेक्षा बरकरार है और स्थानीय स्तर पर भले ही पीटीए को इसके लिए जिम्मेदार माना जाए पर उसकी भी उपेक्षा की जा रही है।
राजु कुमार |