शिक्षा के अधिकार कानून के संदर्भ में निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी के मामले में सरकार की तत्परता को जरा गौर से देखिये। सरकार ने मान लिया है कि आर्थिक संसाधनों, तंत्र को चलाने की क्षमता, शिक्षकों का प्रशिक्षण, इमारत बनाने और प्रशासन की गुणवत्ता के मामलों में निजी क्षेत्र भारत की सरकारों के बेहतर है। वह भारत और गैर-भारतीय बहुराष्ट्रीय पूंजीपति समूहों को शिक्षा के मंदिरों-मस्जिदों को शिक्षा की दुकान बनाने के लिए सौंपने के लिए हर नैतिक-अनैतिक कदम उठाने के लिये तैयार है। शिक्षा समाज का निर्माण करती है, और जब फायदे के लिये हर तरह की हिंसा कर देने वाले व्यापारिक संस्थान शिक्षा की रूपरेखा तय करेंगे तो कैसे समाज का निर्माण होगा, यह आपको तय करना है!! हमें खुद से यह सवाल बार-बार पूछना चाहिये कि क्या निजी स्कूल गरीब-आदिवासी सुदूर बस्तियों में जाकर शिक्षा देंगे, क्या वे 14 वर्ष की आयु के पूरा होते ही बच्चों को स्कूल से बाहर नहीं निकाल देंगे? क्या वे समान शिक्षा की पहल करेंगे?
6 से 14 वर्ष की उम्र के हर बच्चे को अंतत: शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा मिल गया और उन्हें मुफ्त शिक्षा का अधिकार दिलाने वाला कनून 1 अप्रैल 2010 से लागू हो गया। यह एक ऐसी उपलब्धि है जो तीन दशकों के संघर्ष के बाद हासिल तो हुई पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर गई कि इस अधिकार को हम जमीन पर उतारेंगे कैसे? वर्ष 1991 के बाद से हम लगातार यह देख रहे हैं कि राज्य यानी की सरकार लोककल्याण और मौलिक अधिकारों को लागू करने की जिम्मेदारी से पीछे हट रही है और निजी सार्वजनिक हिस्सेदारी के नाम पर निजी बाजार को इसमें शामिल कर रही है। यह बार-बार कहा जा रहा है कि शिक्षा के अधिकार के कानून को लागू करने के लिए अगले 5 वर्षों में 1.78 लाख करोड़ रूपये की जरूरत होगी क्योंकि 80 लाख और बच्चों को स्कूल में लाना है, 5.10 लाख शिक्षकों की कमी को भी पूरा करना है, स्कूलों में 19 लाख कमरे बनाये जाने की जरूरत है, 1.29 लाख मौजूदा स्कूलों का उन्नयन करना होगा। कानून लागू होने करने के साथ ही केन्द्र सरकार ने संसाधनों की आपूर्ति करने के माले में हाथ खड़े कर दिये हैं। पहले ही साल इस कानून को लागू करने के लिए 34 हजार करोड़ रूपये की जरूरत है परन्तु भारत सरकार ने वर्ष 2010-11 में केवल 15 हजार करोड़ रूपये का ही आवंटन किया है। 12 हजार करोड़ रूपये राज्य सरकारें व्यय करने वाली हैं। इसका मतलब साफ है कि 7 हजार करोड़ रूपये की कमी बनी रहने वाली है इस कानून के लिए।
संसाधनों की कमी भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने हमेशा भोगी है क्योंकि सरकारों ने विकास के इस मूलभूत प्रतिमान को हमेशा दोयम दर्जा दिया है। अब कानून लागू करने के साथ-साथ सरकार ने इसमें भी निजी क्षेत्रों को आमंत्रित करने की नीति बनाई है। संसाधनों की कमी, सरकार की शिक्षा के अधिकार की प्रतिबध्दता और निजी क्षेत्र के मुंह में लगे खून को हमें एक साथ जोड़कर देखना होगा क्योंकि अब यह एक राजनैतिक अर्थव्यवस्था का मामला है। निजी क्षेत्र न केवल खूब आर्थिक लाभ उठाने की रणनीति बना रहा है बल्कि मैकाले की उस शिक्षा पध्दति को नया रूप देने की तैयारी कर रहा है जो बाबू और सरकार के पिछलग्गू पैदा करने के लिये लागू की गई थी। निजी क्षेत्र ऐसी नई शिक्षा व्यवस्था चाहता है जो तथा-कथित प्रबंधक पैदा करे, नई पीढ़ी की विचार और मौलिक तर्क क्षमता को बाधित करें ; ताकि ये पीढ़ी नव पूंजीवाद के इशारे पर चल पड़े। सरकार का कहना है कि जितने संसाधनों की जरूरत इस कानून को लागू करने के लिये पड़ेगी; उतने संसाधन सरकार के पास नहीं हैं। सरकार इस मामले में भी सच नहीं बोल रही है; असल में सरकार निजी क्षेत्र को फायदा पहुंचाना चाहती है। पिछले वित्ताीय वर्ष में भारत सरकार ने कार्पोरेट और निजी क्षेत्र को एक साल में ही 4.18 लाख करोड़ रूपये की रियायतें दीं; इस साल आयकर में मध्यम और उच्च वर्ग को जो छूट दी गई उससे ही 55 हजार करोड़ रूपये का आय में नुकसान हो गया। इसके बाद हम देखतें हैं कि परमाणु पनडुब्बी खरीदने के लिये एक लाख करोड़ रूपये बिना हिचक और बिना बहस आवंटित कर दिये जाते हैं परन्तु पांच साल में शिक्षा के लिये 1.78 लाख करोड़ रूपये आवंटित करने में सरकार के पेट में दर्द हो रहा है। दरअसल इस दर्द की दवा उस निजी क्षेत्र के पास है जो राजनैतिक दलों को लगातार अनाधिकृत और अनुचित फायदा पहुंचाता है। निजी क्षेत्र मूलत: शिक्षा में जनकल्याण की भावना से अपनी भूमिका निभाने को आतुर नहीं है बल्कि वह इस क्षेत्र में बड़ा बाजार देख रहा है और भारत के बड़ो व्यापारिक संघ का आंकल है कि अगले पांच वर्षों में इस कानून के जरिये 3.90 लाख करोड़ रूपये कमाये जा सकते हैं।
मौजूदा शिक्षा का अधिकार कानून के परिप्रेक्ष्य में निजी-सार्वजनिक साझेदारी की नीति को समझना जरूरी है। यह कानून कहता है कि हर निजी स्कूल को 25 प्रतिशत स्थान गरीब और वंचित तबकों के बच्चों के लिये सुनिश्चित करना होंगे। यह भी जान लीजिये कि इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च निजी स्कूल नहीं उठायेंगे बल्कि हमारी सरकार उन स्कूलों को अपने खाते से हर बच्चे की फीस और अन्य खर्चों का भुगतान करेगी। इसी तरह स्कूलों की इमारतें और व्यवस्था बनाने में निजी क्षेत्र से साझेदारी की संभावना तलाशी जा रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सोच यह है कि निजी क्षेत्र स्कूलों पर शुरूआती अधोसंरचनात्मक विकास करें, जिसका सरकार ही 20 से 30 साल में शुल्क दे-दे कर वापस भुगतान कर देगी। अंत में इसका मालिकाना हक भी निजी कम्पनी को ही सौंप दिया जायेगा। यानी सरकारी संसाधनों से निजी क्षेत्र की सम्पत्ति का निर्माण कराया जायेगा, यह अनुचित और आपराधिक कृत्य है। जब निजी स्कूलों में दी जाने वाले शिक्षा और अन्य खर्चे सरकार को ही उठाने हैं तो सरकार अपने ही तंत्र को विकसित करने के लिये पांच साल में दो लाख करोड़ क्यों खर्चने को तेयार नहीं है? क्यों सार्वजनिक धन से निजी क्षेत्र के फायदे दिये जा रहे हैं? यह एक संवैधानिक अपराध है। अब तो सरकार अपने स्कूल भी ठेके पर निजी क्षेत्र को सौंपने की तैयारी मे है। जरा सोचिये, जब स्कूली शिक्षा निजी क्षेत्र के हांथों में होगी तब पंचायत जैसे स्थानीय निकायों की क्या इनमें कोई भूमिका होगी? लोग कोई सवाल न पूछ सकेंगे न ही निगरानी कर सकेंगे।
स्कूल के प्रबंधन, नियुक्ति और संचालन की पूरी स्वतंत्रता निजी क्षेत्र को देने की बात कही जा रही है। इतना ही नहीं मौजूदा कानून निजी स्कूलों द्वारा फीस के निर्धारण की पूरी स्वच्छंदता दे रहा है, यानी जितनी चाहे उतनी फीस वे तय कर सकेंगे जबकि सन् 1997-98 में एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि फीस नियमन का काम सरकार के हाथ में रहना चाहिये। इसके साथ ही कई और व्यावहारिक सवाल निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर मुंह बाये खड़े हैं। पहली बात बड़े और चुनिंदा निजी स्कूलों को सामने रखकर यह धारणा बनाते हैं कि निजी स्कूल बेहतर शिक्षा देते हैं पर क्या हर निजी स्कूल गुणवत्ताा पूर्ण और मानक शिक्षा देता है, जवाब है नहीं। 90 प्रतिशत निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से बदतर हालत मे हैं। दूसरी बात-निजी स्कूलों शहरों और नगरों के स्तर पर तो झण्डा ताने रहते हैं परन्तु क्या वे सुदूर और अंदरूनी आदिवासी-ग्रामीण इलाकों में जाकर शिक्षा का अधिकार बच्चों को देने की जहमत उठायेंगे। यह कानून 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा का अधिकार देता है, 14 वर्ष की आयु में पहुंचने पर सरकार किसी भी निजी स्कूल को बच्चों की फीस देना बंद कर देगी तब क्या यह अपमान समाज में एक नया बहिष्कृत वर्ग पैदा नहीं करेगा जब निजी स्कूल उन बच्चों से फीस की मांग करेगा? मोबाईल फोन के विस्तार में निजी क्षेत्र की भूमिका को शिक्षा के अधिकार से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। निजी क्षेत्र यह जानता है कि यदि मोबाईल मंहगे किये गये तो लोग उपयोग करना बंद कर देंगे। इसलिये वे उसका व्यय संयमित रखते हैं परन्तु शिक्षा बुनियादी जरूरत है और लोग मंहगा होने पर भी शिक्षा लेने की कोशिश करते रहेंगे। इसी जरूरत का स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी फायदा उठाया जा रहा हैं।
सरकार उद्योगपतियों के समक्ष इतनी नतमस्तक हो गई है कि यह कहने में उसे बिल्कुल हिचक नहीं कि सरकारी तंत्र कठोर और बंधा-बंधाया होता है परन्तु निजी क्षेत्र ज्यादा लचीला होता है जिससे शिक्षा में ज्यादा सुधार होगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रस्ताव पत्र कहता है कि निजी क्षेत्र में ज्यादा विशेषज्ञता होती है, यदि ऐसा है तो सरकार अपने तंत्र में विशेषज्ञता के विकास के लिये पहल करने से क्यों कतराती रही? एक सरकारी स्कूल को खोलने में और उसका संचालन शुरू करने में 3 वर्ष लगते हैं जबकि निजी क्षेत्र यह समय अधिकतम 18 माह होता है, सरकार का प्रशिक्षण तंत्र, तौर-तरीके अच्छे नहीं हैं, सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ताा के मामले मे कोई जवाबदेहिता नहीं है, सरकारी तंत्र में लचीलापन नहीं है। आज कक्षा 11 और 12 में सकल नामांकन अनुपात 40.6 प्रतिशत है और इसे 65 प्रतिशत तक लाने के लिये योजना आयोग के मुताबिक 1.45 लाख करोड़ रूपये की जरूरत है, यह राशि जुटाना सरकार के बूते की बात नहीं हे। यह केवल निजी क्षेत्र कर सकता है। सरकारी तंत्र की आलोचना के बिंदु कोई सामाजिक कार्यकर्ता या सरकार विरोधी संस्था ने नहीं उठाये हैं। निजी क्षेत्र के लिये शिक्षा के व्यापार की सेज सजाने के लिये सरकार खुद अपनी जांघ उघाड़ रही है। वह जानती है कि कहां-कहां गड़बड़ है परन्तु फिर भी तंत्र को सुधारने के बजाये जिम्मेदारी को निजी क्षेत्र को सौंपकर वह मुक्त हो जाना चाहती है जवाब देहिता से।
आखिरी बात सरकार को याद दिलाने के लिये - शिक्षा भारतीय संविधान के मुताबिक बच्चों का मौलिक-अधिकार है, जिसे सुनिष्चित करने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है निजी क्षेत्र को नहीं। शिक्षा एक आर्थिक व्यवहार नहीं है, इसे ठेके पर नहीं दिया जा सकता है। भारत के संविधान की नौंवी अनुसूची और अनुच्छेद 243 जी के मुताबिक प्राथमिक और सेकेण्डरी स्तर की षिक्षा का क्षेत्र पंचायतों को सौंपा गया है, जिसके बारे में सरकार इस तरह के अतार्किक और गैर-जवाबदेय? नीति नहीं बना सकती है।
सचिन कुमार जैन |