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  कैसे मिले बेहतर शिक्षा, कैसे मिटे भेदभाव  
     
 

शिक्षा के लिए वैश्विक अभियान द्वारा पूरे विश्व में हर साल ग्लोबल एक्शन वीक (वैश्विक शिक्षा सप्ताह) मनाया जाता है। इस सप्ताह को मनाने की पीछे यह मकसद है कि दुनिया के देशों द्वारा सभी बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए जो वैश्विक वादा किया गया है, उन्हें उसकी याद दिलायी जाए। इस बार इस सप्ताह के लिए केन्द्रीय विषय गुणवत्तपूर्ण शिक्षा से भेदभाव की समाप्ति तय किया गया। यह अभियान पूरी दुनिया में चलाया गया। शिक्षा के लिए तय लक्ष्यों को पाने के लिए सभी देशों एवं देश के भीतर राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। इस तारतम्य में मध्यप्रदेश में प्रारंभिक शिक्षा की स्थिति को देखा जाए तो आज भी बेहतर नहीं है, भले ही सरकार यह दावा करे कि शिक्षा के क्षेत्र में उसने आमूलचूल परिवर्तन कर दिया है। कई सरकारी और गैर सरकारी आंकड़ों से इस बात की पुष्टि होती है। अभी हाल ही में जारी डाईस रिपोर्ट को देखा जाए या फिर गैर सरकारी संस्थाओं के आंकड़ों को देखा जाए, सभी ने अपनी रिपोर्ट में कमोबेश शिक्षा की दयनीय दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इन आंकड़ों एवं तथ्यों को देखकर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि बच्चों को कैसे बेहतर शिक्षा मिलेगी और शिक्षा के माध्यम से कैसे भेदभाव रहित समाज का सपना पूरा किया जा सकेगा?

प्रदेश के 10 जिलों में प्राथमिक व मिडिल स्तर की 401 शालालों में मध्यप्रदेश शिक्षा अभियान हस्तक्षेप कर शिक्षा की स्थिति का आकलन कर रहा है। इनमें 332 प्राथमिक शालाएं हैेंं। इन प्राथमिक शालाओं में शिक्षा गारंटी शाला एवं उन्नयन की हुई शिक्षा गारंटी शालाओं का हिस्सा 40 फीसदी बैठता हैं। यह चिंतनीय तथ्य है कि 401 शालाओं में एकल शिक्षकीय शालाओं का प्रतिशत 23 फीसदी है। आदिवासी बहुल 5 जिले जिलों (धार, झाबुआ, सिवनी, सीधी एवं छिंदवाड़ा) के 237 स्कूलों में एकल शिक्षक शालाओं का हिस्सा 34.2 (81 शालाएं) फीसदी हैं जिनमें लगभग 50 फीसदी हिस्सा (40 शालांए) शिक्षा गारंटी शालाओं का है। 5 जिलों की 81 एकल शालाओं में 4964 बच्चे दर्ज है।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार अच्छी शिक्षा के लिए 30 बच्चों पर एक शिक्षक लगाया जाना जरूरी है एवं छात्र शिक्षक अनुपात 1:30 रखे जाने की अनुशंसा की गई है। सर्वशिक्षा अभियान के तहत यह अनुपात 1:40 कर दिया गया है। शाला में 1:40 के अनुपात में शिक्षक नियुक्ति एवं प्राथमिक शाला में कम से कम 2 शिक्षक, माध्यमिक शाला में कक्षावार एक शिक्षक नियुक्त किए जाने का प्रावधान सर्व शिक्षा अभियान के तहत तय है। अफसोसजनक स्थिति है कि उपरोक्त पांच जिलों में 4964 बच्चे एकल शिक्षक शाला में दर्ज होकर बदतर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर है। डाईस प्रतिवेदन 2008 के अनुसार मध्यप्रदेश में प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर एकल शिक्षक शालाओं का प्रतिशत 22.12 हैं। यानी 19405 शालाओं में एक-एक शिक्षक नियुक्त है। इन प्राथमिक शालाओं में दर्ज बच्चों का प्रतिशत 19.04 है अर्थात कक्षा 1 से 5 में दर्ज लगभग 21460595 बच्चों की पढ़ाई एकल शिक्षक शाला में की जाती है। यह चौंकाने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2004-05 में एकल शिक्षक शालाओं में पढ़ने वाले बच्चों का प्रतिशत 17.7 था, जो वर्ष 2005-6 में 19 प्रतिशत तक बढ़ गया। वर्ष 2004-05 में 100 से ज्यादा बच्चों पर एक शिक्षक के औसत वाली शालाओं का प्रतिशत 4.7 था जो वर्ष 2005-6 में 6 प्रतिशत हो गया।

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के अंर्तगत शिक्षा गारंटी केंद्र एवं वैकल्पिक शालाएं स्थापित करने की परंपरा विकसित हुई थी, जो वर्ष 2005 तक चलती रही। इन शालाओं की खूबी यह थी कि भवन हो या न हो लेकिन स्थानीय स्तर पर बच्चों को शिक्षण सुविधा देने के नाम गांव के किसी भी एक नवयुवक को गुरुजी के रूप में नियुक्त कर लिया जाता था। नियुक्त किये जाने वाले इन गुरुजी की न्यूनतम योग्यता दसवीं या पुरानी 11 वीं कक्षा का सर्टिफिकेट रखी गई थी।

यह महव्वपूर्ण तथ्य है कि शिक्षा गांरटी केंद्र के नाम से स्थापित एकल शिक्षकीय शालाएं दूरदराज, आदिवासी एवं दलित बाहुल्य गांवों में अधिक स्थापित हुई हैं। इन शालाओं में योग्य प्रशिक्षित शिक्षक की नियुक्ति आवश्यक नही मानी गई थी, बल्कि गांव में गुरुजी के रूप में चयनित युवक को 30 दिवसीय प्रशिक्षण देकर पढ़ाने योग्य मान लिया गया।

वर्ष 2006 में राष्ट्रीय योजना आयोग ने शिक्षा गारंटी केंद्रों को आधी-अधूरी शाला कहते हुए तत्काल प्राथमिक शाला में उन्नयित किये जाने की कार्यवाही करने की सिफारिश की एवं सर्व शिक्षा अभियान द्वारा सभी शिक्षा गारंटी केंद्रों को उन्नयन कर ईजीएस शाला कहना शुरू कर दिया। उन्नयन के नाम पर इन केद्रोेंं मेें दस हजार रुपये के शैक्षणिक उपकरण खरीदने के लिए धन उपलब्ध कराना एवं अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति एवं बच्चों के बैठने के लिए कक्षों का निर्माण करना था। पर इन शालाओं में शैक्षणिक सत्र 2006-07 एवं 2007-08 के दरम्यान शैक्षणिक उपकरण के लिए दी जाने वाली राशि पहुंचाने का प्रयास बहुत धीमी गति से हुआ, शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई परं शिक्षा गारंटी केंद्रों का उन्नयन कर पूर्णकालिक शाला के दर्जे में शामिल कर लिया गया।

शैक्षणिक उपकरण के लिए दस हजार रुपये की राशि का स्थानांतरण भी समय से नही किया जा सका, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में रखे गये लक्ष्य के विरूध्द केवल 40 फीसदी राशि का स्थानांतरण हो सका एवं आज भी कई केंद्रों पर राशि पहुंचनी शेष है। शिक्षकों का भी इंतजाम आज तक पूरा नही हो सका है। उन्नयित शालाओं में कम से कम 2 शिक्षकों की नियुक्ति की जानी थी जो आज भी पूरी नहीं हो सकी है। यानी आदिवासी एवं दलित समुदाय के बच्चे आने वाले दशक में भी अच्छी शिक्षा के अधिकार से वंचित ही रहेंगे।

यदि बच्चों को बेहतर एवं समुचित शिक्षा नही मिल पाती है, तो इसके पीछे यह साजिश साफ दिखती है कि गरीब एवं वंचित तबकों को शिक्षा उपलब्ध कराने के मामले में सरकार गंभीर नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सरकारी शालाओं के बारे में यह धारणा बना ली गई है कि वे दलितों, आदिवासियों, गरीबों एवं झुग्गी में रहने वालों लोगों के लिए हैं। यदि उन्हें बेहतर शिक्षा नहीं मिल पाए, तो क्या फर्क पड़ता है, उन शालाओं की स्थिति नहीं सुधरी तो क्या फर्क पड़ता है। अब मध्यम वर्ग की भी यह धारणा हो गई है कि सरकारी शालाओं का सेहत नहीं सुधरने वाला, इसलिए उन्होंने उस पर ध्यान देने के बजाय निजी शालाओं की ओर रुख करना बेहतर समझ लिया है। सरकार एवं शिक्षा के माफिया भी यही चाहते हैं। इसलिए यह एक गंभीर सवाल है कि संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद दलितों, आदिवासियों एवं गरीब तबकों तक बेहतर शिक्षा कैसे पहुंचे और सामाजिक एवं आर्थिक भेदभाव की समाप्ति की दिशा में कैसे आगे बढ़ें?

राजु कुमार

 
     
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