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मध्यप्रदेश से रोजगार के अभाव में रोजी-रोटी के लिए लाखों परिवार बडे शहरों और अन्य राज्यों में पलायन कर जाते हैं। यह साल-दर-साल की समस्या है। इन परिवारों के साथ छोटे बच्चे भी पलायन कर जाते हैं, जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाती है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसकी वजह से बच्चों की शिक्षा अधूरी रह जाती है, साथ ही प्रदेश में ड्रॉप आउट की दर भी ज्यादा है। इस समस्या का समाधान पलायन रोक कर हीे की जा सकती है, पर प्रदेश में रोजगार के अभाव, पानी की समस्या और सूखे की स्थिति के कारण ऐसा कर पाना संभव नहीं दिखता। ऐसे में बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, इस दिशा में एक प्रारंभिक प्रयास के तहत झाबुआ से पलायन कर गुजरात के अमरेली, राजकोट एवं सुरेन्द्रनगर जिलों में जाने वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए यूनिसेफ के सहयोग से सर्व शिक्षा अभियान एवं एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा 22 मोबाइल शाला खोली जा रही हैं। उल्लेखनीय है कि झाबुआ से हजारों आदिवासी परिवार प्रति वर्ष इन महीनों में पलायन कर गुजरात के बडे शहरों का रुख कर लेते है। झाबुआ में साक्षरता दर कम होने के एक प्रमुख कारणों में पलायन एक प्रमुख कारण रहा है।
यूनिसेफ के राज्य प्रतिनिधि हामिद-अल-बशीर का कहना है कि मोबाइल शाला का उद्देश्य वंचित समुदाय के बच्चों की शिक्षा के अधिकार का हिफाजत करना है। उन्होंने बताया कि बदली हुई परिस्थितियों में परम्परागत शालाओ को नई चुनौतियों का सामना करने में मुश्किलें आ रही हैं, ऐसे में पलायन कर अन्य जगहों पर काम करने वाले परिवार के बच्चाें के लिये मोबाइल शाला एक नवाचारी प्रयोग है। इस साल भाबरा एवं जोबट से पलायन करने वाले परिवारों के 600 बच्चों के लिये 22 शालायें गुजरात के अमरेली, राजकोट एवं सुरेन्द्र नगर जिलों में खोली जा रही है। इनकी सफलता के बाद अगले साल 100 मोबाइल शाला खोलने के लिए यूनिसेफ सहयोग करेगा। सफलता के लिए लगातार निगरानी करने एवं समुदाय को प्रोत्साहित करने की जरुरत है। जनवरी मे कलेक्टर, विधायक, समुदाय के प्रतिनिधि एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ इसके लिए बैठक की जायेगी। झाबुआ के कलेक्टर राजकुमार पाठक का कहना है कि जिले से लगभग दो लाख लोगों का पलायन होता है, इसलिए और अधिक मोबाइल शालाओं की जरुरत पडेगी। गुजरात सरकार से अग्राह किया गया है कि मोबाइल शाला के शिक्षकों को रहने के लिए नि:शुल्क आवास मुहैया कराये। भाबरा विधायक माधोसिंह डावर का मानना है कि पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए झाबुआ में अस्थाई अश्राम खोलने का विचार करना चाहिए। उन्होंने बताया कि जिला के लिए करोडों रुपये का कार्य रोजगार गारंटी योजना में स्वीकृत हुआ है, फिर भी लोगाें का पलायन जारी है, क्योंकि उन जिलों में इन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती है।
उल्लेखनीय है कि मोबाइल शाला में मध्यप्रदेश का ही पाठयक्रम पढाया जायेगा और घर वापसी के बाद उन बच्चों को उनकी शालाओं से पुन: जोड दिया जाएगा। यह मोबाइल शाला टेण्टों में संचालित होगा और जब पलायन वाले परिवार वापस आएंगे, तो मोबाइल शाला को स्थगित कर दिया जाएगा। मोबाइल शाला प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए हैं। मोबाइल शाला का क्रियान्वयन स्वयंसेवी संस्था लोक विकास एवं अनुसंधान ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। ट्रस्ट से जुड़े तपन भट्टाचार्य का कहना है कि मोबाइल शाला के शिक्षक झाबुआ के ही हैं, जिन्हें पलायन करने वाले परिवार के बच्चों को पढ़ाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
राजु कुमार |
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