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  बुनियादी हकों से महरूम जंगल के वशिंदे  
     
 

भोपाल से होशंगाबाद जाते समय बरखेड़ा गांव के बाद सोलह किलोमीटर तक घना जंगल है। बरसात के दिनों में यह रास्ता बेहद खूबसूरती लिए होता है। आने-जाने वाले लोगों के लिए यह मन प्रफुल्लित कर देने वाला होता है लेकिन इन्हीं जंगलों के बीच बसे कुछ गांवों में विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुंच पाई है। इसी रास्ते से गुजरते हुए काशीराम बारोला से मुलाकात हुई। काशीराम, उम्र कोई सोलह साल। हाथ में एक कापी-किताब लिए। आगे तक छोड़ देने की विनय को मैं ठुकरा ना सका।

काशीराम कक्षा ग्यारह का छात्र है। गांव से जंगल के रास्ते होते हुए सड़क तक आना और यहां से हर दिन किसी ट्रक पर चढ़कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के विधानसभा क्षेत्र बुधनी स्थित स्कूल जाना। यह उसका रोज का नियम है। पर ऐसा करने वाला वह अपने गांव का अकेला लड़का है। लगभग तीस घरों के इस छोटे से गांव में केवल शिक्षा गारंटी योजना का एक स्कूल है। ना आंगनबाड़ी और न कोई स्वास्थ्य केन्द्र। आगे की पढ़ाई के लिए या तो बुधनी जाना होता है या फिर लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर औबेदुल्लागंज। यही हाल बीमार होने पर होता है। आजादी के साठ सालों बाद भी यहां बिजली नहीं पहुंच पाई है। इसके नतीजे सामने यह आते हैं कि गांव के अधिकांश लड़कों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है, लड़कियों की तो बात ही दूर है, महिला और बच्चों के पोषण और सुरक्षा के लिए चलाई जा रही योजनाओं का उन्हें फायदा नहीं मिल पाता और इलाज के अभाव कई लोग दम तोड़ देते हैं। काशीराम ने बताया कि उसके गांव से वह अकेला लड़का है जो कक्षा दस के बाद पढ़ाई कर रहा है।

गांव में लड़कियों की पढ़ाई की स्थिति बेहद खराब हैं। बबली ने बताया कि वह इसलिए नहीं पढ़ पाई क्योंकि इन कठिन परिस्थितियों में वह शहर में पढ़ने के लिए नहीं जा सकती। कुछ समय पहले यहां प्रसव के दौरान एक महिला ने दम तोड़ दिया था। सरकार भले ही प्रसव परिवहन योजना के माध्यम से प्रसव मृत्यु कम करने की दिषा मे ंकोशिश कर रही हो लेकिन दूर-दराज के इन गांवों में संचार के साधन उपलब्ध ना हो पाने के कारण्ा कठिन स्थितियां बन जाती हैं। सरकारी अस्पतालों में ढांचागत सुविधाओं में कमी होने के कारण गर्भवती महिलाओं को ज्यादा दिनों तक भर्ती भी नहीं रखा जा सकता। इस स्थिति में जंगल और दूरस्थ इलाकों में रहने वाली आबादी के लिए इन योजनाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसी जिले के सोहागपुर ब्लॉक में एक महिला ने रात को नौ बजे सड़क पर बच्चे को जन्म दे दिया। इस दंपत्ति को मालूम ही नहीं था कि अस्पताल में फोन करने पर उन्हें जननी एक्सप्रेस का फायदा मिल सकता है। इस पर अस्पताल प्रबंधन और एसडीएम का कहना था कि हमें ऐसी कोई सूचना ही नहीं मिली नही ंतो उन्हें जननी एक्सप्रेस का फायदा जरूर मिलता। पर इस स्थिति में भी जवाबदेहिता से बचा नहीं जा सकता है। हर गांवों में आंगनबाड़ियों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को पोषणआहार के साथ ही इस बात की भी जानकारी देनी चाहिए कि प्रसव परिवहन के लिए उन्हें वाहन उपलब्ध कराया जा सकता है। लेकिन प्रदेश की पूरी जनसंख्या को आंगनबाड़ियां कवर ही नहीं कर पाती हैं। इसके लिए लगभग पचास हजार आंगनबाडियां और खोली जानी हैं। इस स्थिति में स्वास्थ्य योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए अधिक कोशिशें करनी चाहिए। दूरस्थ और वनग्रामों में इसकी जरूरत कहीं ज्यादा है।

 
     
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