कोहिमा/खोनोमा (नगालैण्ड)। सुदूर उत्तार-पूर्वी राज्य नगालैण्ड सामुदायिक विकेन्द्रीकरण के सबसे सफल प्रयोग का केन्द्र बन गया है। इस राज्य के प्रयासों ने यह सिध्द कर दिया है कि लोक अधिकारों के लिए लोक संस्थाओं का प्रबन्धन करने में आदिवासी समुदाय पूरी तरह सक्षम है। नगालैण्ड के अंगामी आदिवासी खोनोमा गांव में 6 स्कूल होने के बावजूद वर्ष 2002 के पहले 32 फीसदी बच्चे स्कूल के बाहर थे, शिक्षकों की मौजूदगी भी बेहद भरोसेमंद नहीं थी। सरकारी प्राथमिक स्कूल की इमारत और सुअरों को बांधने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले बाड़े में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था। अब खोनोमा का वर्तमान इतिहास से बिल्कुल जुदा नजर आता है। इस गांव के हर बच्चे का नाम न केवल स्कूल के रजिस्टर में दर्ज है बल्कि उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिये अब पूरी व्यवस्था बन चुकी है। केवल नगालैण्ड में वर्ष 2002 से चल रही ''सामुदायिकीकरण'' की अवधारणा को संयुक्त राष्ट्र संघ ने जुलाई 2008 में एक आदर्श शासन व्यवस्था के रूप में स्वीकार करते हुये देश-दुनिया में अन्य इलाकों में लागू करने की वकालत की है।
कोहिमा की मिडलैण्ड वार्ड शिक्षा समिति को क्षेत्र में स्कूल से बाहर बच्चों की स्थिति के बारे में अध्ययन कराना था, तो उन्होंने आपस में जरूरी राशि इकट्ठा करके अध्ययन पूरा कर लिया, स्कूल के लिये रैनेली बेल्हो ने जमीन दान दे दी, दो कमरों का निर्माण करने में सबने मिलकर पहाड़ी इलाके में 5600 ईटें निर्माण स्थल तक पहुंचाई और समिति ने तय किया कि वह शैक्षणिक सत्र की समाप्ति पर विषयवार शिक्षकों के काम का गुणात्मक मूल्यांकन करेगी जिसम बच्चे भी शामिल होंगे मिडलैण्ड वार्ड शिक्षा समिति के अध्यक्ष विस्येहो नीखा गर्व के साथ समुदाय का काम बताते हैं और योजनायें भी। चिंग मेलेन की शिक्षा समिति ने दो नये शिक्षक नियुक्त भी किये और उनके वेतन की व्यवस्था भी समुदाय ने की। इतना ही नहीं गांव में गांव की महिला, युवा एवं विकास समितियों के सहयोग से छात्रावास का निर्माण भी किया गया। नागालैण्ड सरकार ने शिक्षा को विकास का राजनैतिक तत्व माना है और अब वह अपने प्रतिवेदन में उल्लेख करती है कि शिक्षण की प्रक्रिया में स्वार्थ और प्रभुत्व की राजनीति नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 के शैक्षणिक सत्र में प्रयोग के तौर पर 90 गांवों के 205 प्राथमिक स्कूल आदिवासी समाज को सौंपे गये थे, और अब सभी 1286 गांवों के 1459 प्राथमिक स्कूलों का समाजीकरण हो चुका है। इसमें से 890 गांवों में कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर नहीं है। नगालैण्ड ने 21 बच्चों पर एक शिक्षक नियुक्त है जबकि भारत का राष्ट्रीय औसत 42 बच्चों पर एक शिक्षक का है।
उल्लेखनीय है कि सामुदायिकीकरण के बाद सरकार द्वारा तय पाठयक्रम के अलावा बच्चों की आदिवासी अस्मिता और स्थायी विकास की प्रक्रिया के बारे में समझ बनाने में गांव के युवा और महिला समूह सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं। यह जानना बेहद महत्वपूर्ण है कि नगालैण्ड 16 ऐसे आदिवासी समूहों का राज्य है जिनकी भाषा, जीवन संस्कृति और सामुदायिक व्यवस्थायें एक दूसरे से बिल्कुल जुदा है।
नगालैण्ड का उदाहरण इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 1928 से यहां स्वतंत्र नगा राज्य के लिए संगठित संघर्ष चल रहा है। इस संघर्ष में नगालैण्ड के भूमिगत सशस्त्र संगठन और भारत के सुरक्षा बल आमने-सामने हैं। उग्रवाद बच्चों के बुनियादी अधिकारों को गहरे तक घायल कर देता है। नगालैण्ड में स्वतंत्रता के संघर्ष और उग्रवाद के बीच की महीन दीवार टूटती नजर आती है। वहां बच्चे चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के बीच के संघर्ष में 5 दशकों तक फंसे रहे। नगालैण्ड के 350 से ज्यादा स्कूलों में बच्चों की आवाज नहीं बल्कि सुरक्षा बलों की कदमताल गूंजती रही। इन स्कूलों की इमारतों को सरकार और अलगाववादी समूह अपने आवास और संचालन केन्द्र के रूप में उपयोग करते रहे। किग्वेमा गांव का स्कूल भवन 15 वर्ष तक असम राईफल्स का केन्द्र रहा और बच्चे एक भविष्य की असुरक्षा में फंसते रहे।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 371(ए) भी नगालैण्ड के आदिवासी समाज को अपनी पारम्परिक व्यवस्था में जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। इस पूरी आदिवासी सामाजिक व्यवस्था की गहराई को महसूस करते हुये नगालैण्ड सरकार ने लोक सेवाओं के सामुदायिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की और नगालैण्ड लोक संस्थाओं और सेवाओं का सामुदायिकीकरण कानून-2002 के जरिये स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा सहित अन्य सेवाओं-संस्थाओं के नियंत्रण-प्रबंधन के अधिकार समुदाय के सुपूर्द कर दिये। इसी कानून के तहत खोनोमा गांव के चार सरकार स्कूलों का सामुदायिकीकरण करते हुये उन्हें ग्राम शिक्षा समिति को सौंप दिया गया। छह वर्ष गुजर जाने के बाद यह तो साफ़ नजर आता ही है कि कुछ अन्य भारतीय राज्यों की तरह नगालैण्ड में विकेन्द्रीकरण के नाम पर खेल नहीं खेला गया है।
खोनोमा गांव के कोसे सेचे कहते हैं कि इस नई व्यवस्था ने शिक्षा के साथ आदिवासी समुदाय को जोड़ा है। इस जुड़ाव में अब गंभीरता भी है, जिम्मेदारी भी और जवाबदेहिता भी। पहले जब स्कूल में शिक्षक नहीं आया करते थे तो कभी मां-बाप जाकर सवाल नहीं पूंछते थे कि स्कूल में क्या चल रहा है न ही स्कूल को सुंदर और आकर्षक बनाने के बारे में कोई सोचता था, पर जब हमें जिम्मेदारी मिली तो एक साल बाद ही गांव के सारे बच्चे स्कूल में दर्ज हो गये। कोसे बताते हैं कि पहले साल तो केवल व्यवस्था को देखने और समझने का ही काम हुआ। पता चला कि शासकीय प्राथमिक स्कूल में दो शिक्षक तो आते ही नहीं थे। शुरूआत में उनसे कोई बात नहीं हुई और ग्राम शिक्षा समिति ने एक निगरानी समूह ने उपस्थिति रजिस्टर बनाकर हर रोज चारों सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करना शुरू कर दिया। केवल जानकारी हो जान से व्यवस्था नहीं बदल जाती है। शिक्षा समिति के अध्यक्ष दोजू खाने कहते हैं कि यह कानून हमें अधिकार उपयोग करने के हथियार भी देता है। गांव के सभी स्कूलों पर एक ग्राम शिक्षा समिति
का नियंत्रण है और इस समिति में शिक्षकों का भी प्रतिनिधित्व है और समुदाय का भी। इसमे एक चौथाई स्थान महिलाओं का है।
कानून में दो महत्वपूर्ण बाते हैं - अब हर शिक्षक की तनख्वाह शिक्षा समिति के खाते मे जमा होगी और शिक्षा समति ''यदि काम नही तो वेतन नहीं'' के सिध्दान्त को आधार बनाकर हर माह की पहली तारीख को वेतन का भुगतान करेगी। दूसरी बात यह है कि इस समिति को गांव की शिक्षा सम्बन्धी जरूरतें तय करने और उसके हिसाब से काम करने का अधिकार है। विकेन्द्रीकरण का मतलब यह नहीं है कि अब खोनोमा के चारों स्कूलों के प्रति सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है बल्कि अब व्यवस्था यह है कि सरकार आर्थिक संसाधन शिक्षा समिति के खाते में जमा कर देती है और अब समुदाय को संसाधन खर्च करने की स्वतंत्रता भी मिली है। शासकीय प्राथमिक स्कूल के प्रभारी शिक्षक सेल्हू तेरहूजा कहते हैं - हम यह नहीं कह सकते हैे कि समुदाय के हाथ आ जाने से सब कुछ बदल गया है पर अब स्कूलों की दीवारों पर गांव का हक है। वर्ष 2005-06 और 2006-07 में हमारे स्कूल की पुरानी इमारत में तीन कमरों के निर्माण के लिये सरकार ने 5.40 लाख रूपये स्वीकृत किये पर स्कूल की हालत बहुत जर्जर थी तो शिक्षा समिति ने गांव में विचार प्रक्रिया चलाई और तय हुआ कि सरकार द्वारा दी गई राशि से हम 8 कमरे बनायेंगे और आज तीन कमरों की राशि से स्कूल की एक पूरी नई इमारत खड़ी है। शिक्षा के सामुदायिकीकरण के तहत सेल्हू तेरहूजा को स्कूल प्रभारी होने के नाते हर माह अपने संस्थान का प्रगति प्रतिवेदन ग्राम शिक्षा समिति को भेजना होता है जिसमें बच्चों की उपस्थिति, शिक्षकों की उपस्थिति और पाठयक्रम की प्रगति का उल्लेख होता है।
इसी रिपोर्ट के आधार पर शिक्षकों की तनख्वाह का भुगतान होता है। महत्वपूर्ण है कि सरकार शिक्षकों के तीन माह का वेतन अग्रिम शिक्षा समिति के खातों में जमा कर देती है ताकि भुगतान में देरी न हो। सरकार व्यवस्था में बच्चों के शैक्षणिक भ्रमण का प्रावधान नहीं है पर कोहोमा के बच्चे नगालैण्ड के दूसरे हिस्सों के साथ-साथ असम भी घूम चुके हैं।
लोक सेवाओं के सामुदायिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और नगालैण्ड के विकास आयुक्त अलेम्तेशी जमीर कहते हैं कि शिक्षा का प्रबंधन समुदाय के हाथ में एक जिम्मेदारी की तरह भी है और अधिकार की तरह भी। आमतौर पर साक्षरता को मानव विकास का आधार माना जाता है परन्तु हम समग्र शिक्षा की बात कर रहे हैं। हम यह स्वीकार करते हैं कि सरकार पूरी व्यवस्था हाथ में रखकर स्थिति को नहीं सुधार सकती है, लेकिन निजीकरण भी विकल्प नही है। जब तक की समाज खुद प्रबंधन अपने हांथ में न ले ले। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह संसाधन उपलब्ध करवाये और सहयोगी की भूमिका निभाये। सामुदायिकीकरण का मकसद केवल उदाहरण के लिये एक व्यवस्था खड़ी करना नहीं है बल्कि मकसद तो शिक्षा के अधिकार का लोकव्यापीकरण करना है। शिक्षा समिति सरकार के प्रति ही जवाबदेय नही होती है बल्कि इसकी नियमित रिपोर्ट ग्राम विकास बोर्ड और ग्राम परिषद के समक्ष पेश होती है; इससे यह अहसास पैदा होता है कि गांव की शिक्षा समिति सरकार की कठपुतली नहीं हैं। इसी प्रक्रिया में शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। कई कमजोरियों को ढंकने का काम शिक्षकों ने भी किया है। सेल्हू तेरहूजा कहते हैे कि यह जिम्मेदारी आसान नहीं है। वेतन तो समय पर आ जाता है पर निर्माण कार्यों का काम लगातार चलता रहे इसके लिए कभी हमें अपनी (खोनोमा में शिक्षकों ने अपनी स्वयं की संस्था - सिजे सोसायटी यानी भविष्य के लिये संस्था) बना रखी है। सोसायटी में से धन निकालकर उपयोग करते रहना पड़ता है तो कभी गांव के संपन्न आदिवासी ब्याज मुक्त कर्ज दे देते हैं। सरकार ने अब तक चार लाख रूपये दिये हैं तो समुदाय का योगदान 8.25 लाख रूपये का हो चुका है; आखिर यह बच्चों की जिन्दगी का सवाल है।
सचिन कुमार जैन |