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  आदिवासी समुदाय में शिक्षा की स्थिति  
     
 

फागु मैरावी 16 साल का एक युवक है। बालाघाट जिले के लालबरा विकासखण्ड के अपने गांव में फागु अकेला मिडिल पास व्यक्ति है। कहने को तो गांव चिखला के बैगा टोला में प्राथमिक विद्यालय है पर वह केवल प्रतीकात्मक है। स्कूल में एक मात्र अध्यापक प्रेम कुमार मेश्राम है जो शायद ही कभी स्कूल आते हैं। फागु बताता है कि स्कूल में उसके अलावा और बहुत से बच्चोंद का नाम दर्ज है पर उनमें से कोई कभी-कभी ही स्कूल आता है। उसकी उम्र के बच्चे कहते हैं कि स्कूल में जब मास्टर साहब ही नहीं आते हैं तो हम जा के क्या करेंगे? वैसे फागु इसका अपवाद है। मास्टर साहब आएं या नहीं वह प्रतिदिन स्कूल आता था और लगातार मेहनत करके वह पांचवी कक्षा पास कर गया। फागु की लगन को देखकर लोगों ने उसे लालबरा जाकर आगे की पढ़ाई करने को कहा। फागु की मां समरो बाई उसकी अब तक पढ़ाई को ही काफी मानकर उसके लालबरा जाने के इरादे की खिलाफ थी। मगर फागु किसी प्रकार इस बाधा को पार कर गया और मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई पूरी की और अब वह मुक्त विद्यालय में परीक्षा के द्वारा हाईस्कूल (दसवीं) पास करने की तैयारी मे है। फागु है जो किसी प्रेम कुमार या समरो बाई का प्रतिरोध नहीं कर पा रहे हैं और शिक्षा से वंचित रह जा रहे हैं। उनकी परवाह करने वाला कोई नहीं है। वैसे शिक्षा का अधिकार दिलाने वाला एक कानून बना है जो सबको मुफ्त शिक्षा देने की बात करता है। लेकिन यह मुफ्त शिक्षा भी आपको 6 से 14 वर्ष की आयु के बीच ही मिलेगी। तो अब देखना यह है कि ये कानून कितने और फागुओं को शिक्षित बनाता है।

शिक्षा के अधिकार का यह कानून जो कि 1 अप्रैल से लागू हो रहा है से यह उम्मीद की जाती है कि विकास की दौड़ में पीछे छूट गये समुदायों जैसे की दलित एवं आदिवासियों को खास फायदा पहुंचाएं। क्योंकि मुफ्त शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं समुदायों के बच्चों को ज्यादा थी। जो व्यक्ति अपने पेट की आग को ठंडा करने के लिए सारा दिन काम करता है और तब भी बमुश्किल ही सारे परिवार के लिए खाना जुटा पाता है उससे यह उम्मीद करना करना की वह पैसे देकर अपने बच्चे को स्कूल भेजेगा बेमानी ही था। तो इस कानून के पैरोकारों ने इन्हीं को ध्यान में रखकर इसकी मांग की होगी। अगर हम मध्यप्रदेश के संदर्भ में शिक्षा की स्थिति पर नजर डालें तो जो तबका सबसे पिछड़ा नजर आता है वह आदिवासियों का है। मध्यप्रदेश देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। एवं यहां 6 करोड़ लोग रहते हैं। राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत है जो कि 1.22 करोड़ के आसपास बैठता है। आदिवासी जनसंख्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में काफी आगे आता है। अगर हम संख्या की बात करें तो भारत में सबसे ज्यादा आदिवासी मध्यप्रदेश में हैं। राज्य में 11 ऐसे जिले हैं जहां 30 से 50 प्रतिशत तक जनसंख्या आदिवासियों की है। झाबुआ जिले के तो 85 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की है। भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली जहां संख्या बल काफी महत्वपूर्ण है आदिवासियों की ज्यादा संख्या ने उन्हें कुछ खास फायदा नहीं पहुंचाया है। आदिवासी समुदाय अन्य समुदायों से विकास के हर पैमाने पर काफी मध्यप्रदेश में आदिवासियों के औसत शिक्षा दर से बहुत कम है। परम्परागत तौर से आदिवासी समुदाय जंगलों के आसपास के मूलभूत अधोसंरचनात्मक चीजों की पहुंच नहीं है। जिसकी वजह से समुदाय कई सामान्य सुविधाओं से वंचित रह जाता है। इसके अलावा अन्य कई कारण हैं जिनकी वजह से आदिवासी समुदाय अपने बच्चों को स्कूल भेजने से झिझकता है। एक गरीब परिवार बच्चों को एक ऐसे सदस्य के रूप में देखता है स्कूल जाना जो कमाकर कुछ ला सकता है और उनके अनुसार ऐसे स्कूल जाना जहां न तो मास्टर है न ही अन्य सुविधा, समय की बरबादी के समान है।

स्कूल के अंदर भी आदिवासी बच्चों के साथ स्कूल के मास्टर एवं समाज के अगड़ी जाति के बच्चों का व्यवहार समानता का नहीं होता है। उन्हें कक्षा में सबसे पीछे बिठाया जाता है। उनसे छुआछूत किया जाता है। स्कूल में साफ-सफाई का काम भी इन्हीं से कराया जाता है। तो अगर कोई परिवार अपने बच्चे को सकूल भेजता भी है तो उसके ठहराव की संभावना काफी कम हो जाती है। अब जबकि शिक्षा के अधिकार का कानून आ गया है और यह अपने क्रियान्वयन के तरफ है तो यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि आदिवासी बच्चों की स्थिति में इस कानून से क्या बदलाव आता है। जो पिछले 60 सालों में नहीं आ पाया।

मध्यप्रदेश समस्त राज्यों एवं केन्द्रशसित प्रदेश में आदिवासी जनसंख्या के मामले में प्रथम स्थान पर है। मध्यप्रदेश में आदिवासी जनसंख्या में शिक्षा का स्तर काफी नीचे है। राज्य की कुल आदिवासी जनसंख्या का केवल 41.16 प्रतिशत ही शिक्षित है, जबकि देशमें यह स्तर 47.1 प्रतिशत है।

6 से 14 आयु वर्ग के 35.1 लाख आदिवासी बच्चों में 54 प्रतिशत अभी भी स्कूलों से बाहर हैं। इस आयु वर्ग में 18.9 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रही हैं आदिवासी समुदाय में बालिका शिक्षा की स्थिति काफी बुरी है। आदिवासी समुदाय की कुल 41.4 प्रतिशत लड़कियाँ शिक्षित हैं। सहरिया और बैगा समुदाय में यह स्थिति और भी बुरी है। मात्र 15.9 प्रतिशत सहरिया लड़कियों का प्रतिशत ज्यादा है। 45.36 प्रतिशत स्कूल के बाहर लड़कों की तुलना में 54.64 लड़कियां स्कूल से बाहर थी और कुल 10 प्रतिशत स्कूल से बाहर पाए गए। स्कूलों से बाहर निकलते बच्चों की संख्या (क्तवनच वनजध्द स्कूलों में दर्ज न होने वाले बच्चों से ज्यादा थी। इससे यह पता चल रहा था कि बच्चों के नाम स्कूलों में दर्ज तो हो जा रहे थे पर वे काफी जल्दी क्तवनच वनज हो जा रहे थे। स्कूलों से बाहर हो रहे बच्चों में भी लड़कियों की संख्या 60 प्रतिशत है वहीं लड़कों की दर 47.31 प्रतिशत है। 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग में शाला में दर्ज न होने वाले 186 बच्चों में 98 लड़कियाँ हैं।

आदिवासी समुदाय में शिक्षा की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुल आबादी का 10 प्रतिशत से भी कम प्राथमिक से आगे की पढ़ाई कर पाए हैं। अगर हम सहरिया एवं बैगा आदिवासियों को देखें तो स्थिति और भी खराब है। 62.2 प्रतिशत सहरिया एवं 26 प्रतिशत बैगा आदिवासी मात्र प्राइमरी तक शिक्षित हैं मात्र 1.8 प्रतिशत सहरिया आदिवासी माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं। तकनीकी या डिप्लोमा पाठयक्रमों में तो मात्र 0.1 प्रतिशत आदिवासी हैं।

आदिवासी समुदाय की शिक्षा संपूर्ण नागरिक समाज के लिए एक चुनौती का प्रश्नम है। आदिवासी समुदाय में शिक्षा के स्तर को बढ़ाना एवं इसे सुनिश्चित करना एक ऐसी चुनौती है जिसका समाधान हमें समग्रता में ढूंढना होगा, इसके लिए जरूरी है कि पहले हम उन समस्याओं को सुलझाएं जिनके कारण आदिवासी बच्चों का स्कूलों में ठहराव नहीं हो पा रहा है, उनका नामांकन नहीं हो पा रहा, शाला से बाहर होने की दर, खासकर लड़कियों में लगातार बढ़ती जा रही है। बच्चे घरों में, होटलों या ढाबों पर या खेतों के काम कर रहे हैं। कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका हल हमें समस्या की जड़ तक ले जाएगा। इससे निपटने के लिए समाज, राज्य, प्रशासन एवं अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों या संस्थाओं को सघन प्रयास करने होंगे। हमें समस्या का स्वरूप एवं आदिवासी समुदाय जो पहले से ही विकास के इस दौड़ में सीमान्त है, पर इसके असर को समझना होगा। अब, शिक्षा का अधिकार कानून राज्य में क्रियान्वित हो रहा है। आदिवासी समुदाय पर इसके प्रभाव एवं समुदाय में शिक्षा के स्तर में आए बदलाव को देखना होगा। यह कानून आदिवासी बच्चों के शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में किस प्रकार मदद करता है। यह अपने आप में एक चुनौती भरा प्रश्नं होगा। कानून में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों का स्कूलों में नामांकन सुनिष्चित कराने की बात करता है। पर क्या यह कानून ऐसा बातावरण पैदा कर सकेगा जिसमें स्कूलों के अंदर छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयाँ दूर हो सकें और सभी परिवार बिना किसी भय व संकोच के अपने घर की लड़कियों को स्कूल भेज सकें। आदिवासी इलाकों में चल रहे स्कूलों में अधोसंरचना एवं संसाधनों की कमी है। अधिकतर विद्यालययों में मात्र एक पूर्णकालिक योग्य शिक्षक है। अन्य सुविधायें जैसे पृथक शौचालय, चार दीवारी, कक्षा भवन आदि की कमी है। ये तो अधोसंरचनात्मक कमियां हैं लेकिन हम उन कमियों का क्या करें जो आदिवासी शिक्षा के लिए राज्य के खर्चे में आ गई है। इन स्कूलों में जिन शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है वे आदिवासी बच्चों के साथ दोहरा व्यवहार करते हैं। वे इन बच्चों से स्कूल की सफाई आदि का काम कराते हैं। चूंकि आदिवासी समुदाय दूर-दराज इलाकों में रहता है, इस वजह से समुदाय की स्कूलों तक पहुंच भी एक बड़ी समस्या है और एक बड़ा तबका स्कूलों से दूर है।

इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम मानक भाषा है। जबकि आदिवासी समुदाय की अपनी एक अलग बोली है। और बच्चे स्कूलों में जाते हैं जहां उन्हें एक अनजान भाषा में पढ़ाया जाता है। स्कूलों में सारे शिक्षक ऐसे होते हैं जिनका प्रशिक्षण मानक भाषा में हुआ होता है और वे बच्चों को भी उसी भाषा में पढ़ाते हैं जो कि उनके लिए समझने में मुश्किल होता है। स्कूलों में जो पाठयक्रम पढ़ाया जाता है उसमें भी इनकी संस्कृति, रहन-सहन आदि का कोई विवरण नहीं होता है जो कि इन बच्चों के शाला से बाहर होने के कारणों में से एक है।

शिक्षा का अधिकार कानून की एक और खासियत है कि प्राइवेट स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित करना। इसका भी दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। क्योंकि जिनके इलाकों में वे रहते हैं वहां इनके पड़ोस के स्कूल में तो पीने के पानी और शौचालय की सुविधा ही नहीं होती है। ऐसे में ये 25 प्रतिशत का कोटा आदिवासी शिक्षा का होगा। शिक्षा का अधिकार कानून 6 से 14 वर्ष के बच्चों को 8 वर्ष की मुफ्त शिक्षा देने की बात करता है। तो क्या हम यह मान लें कि हमारे देश के बच्चों को मात्र 8वीं तक ही शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। क्या आठ साल शिक्षा ही बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए काफी है। इस वक्त जरूरत यह है कि राज्य ऐसे स्कूल खोजे जो बच्चों को उनकी भाषा में उनकी जरूरतों का ध्यान रखकर उन्हें शिक्षा दें। जबकि हो ये रहा है कि हमारी सरकार जन-भागीदारी (निजी भागीदारी) को व्यापार बना देगी। शिक्षा को समाज की इस सबसे कमजोर तबके तक पहुंचाने के लिए राज्य को जिमेदारी लेनी होगी इन इलाकों में वो सारी मूलभूत सुविधाएं पहुंचानी होंगी, जो ऐसे वातावरण का निर्माण करे जिसमें सभी बच्चे समान शिक्षा प्राप्त कर सकें। उन इलाकों में जहां आदिवासी समुदाय रहता है ज्यादा से ज्यादा स्कूल खोले जाएं ओर उनमें सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

हमें यह समझना होगा कि एक मात्र शिक्षा के अधिकार कानून से ही आदिवासियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। बदलाव के लिए जरूरी है कि उनकी कुछ मूल समस्याओं के हल ढूंढना होगा। कोई परिवार ये नहीं चाहता कि उसके बच्चे स्कूल जाने के बजाये काम करें। ऐसे समुदाय जिन्हें विकास की सीमाओं पर छोड़ दिया गया है वो सारा दिन अपनी पूरी ताकत से सिर्फ इसलिए काम करते हैं कि वो दो वक्त का भोजन जुटा सकें पर कई बार इसमें भी सफल नहीं हो पाते हैं। अशिक्षा की समस्या एक ऐसा प्रश्नक है जिसकी जड़ काफी गहरी जमीं हुई है। शानदार नीतियों ओर कानून बना देने से ही ये समस्या हल हो जाएगी ये एक बचकानी सोच है। इसके लिए पहले हमे उन कारणों को समझना होगा जिनकी वजह से बच्चों को अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए काम करना पड़ता है। इसकी जड़ में वो व्यवस्था है जो व्यक्ति एवं समुदायों को आम और खास में बांटता है। अब इस व्यवस्था के परिवर्तन की बात होनी चाहिए।

श्री मधुकर

 
     
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