बड़वानी जिले में पाटी में रहने वाला नाथू आदिवासी मानसिक रूप से विकलांग है। रहने को गांव में एक छोटी सी झोंपड़ी है जिसमे करवट लेने में भी एहतिहात बरतनी पड़ती है। उसकी देखभाल करते हुये पत्नी को कभी-कभार मिलने वाली मजदूरी से महरूम हो जाना पड़ता है। खाने के लाले पड़ना तो जैसे रोजमर्रा की बात है। गांव की सभा, पंचायत और समुदाय सब कोई मानते हैं कि नाथू को सरकारी सहायता मिलना चाहिए, जो उसे कभी मिल नहीं पाई।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने आदेश में कहा है कि हर उस परिवार को सस्ते राशन वाली अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ मिलना चाहिये जिसमें मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति हो। इसी उम्मीद के सहारे नाथू ने भी अन्त्योदय कार्ड के लिए आवेदन दिया था परन्तु मानसिक रूप से विकलांग होने का प्रमाण पत्र संलग्न न होने के कारण उसे अपात्र करार दिया गया। मध्यप्रदेश में गरीबी और भूख के साथ मानसिक विकलांगता की मार झेलने वाले 70 हजार लोगों के लिये जीवन किसी शाप से कम नहीं है। उन्हें अपने हक हासिल करने के लिये प्रमाण पत्र दिखाना होता है और यह प्रमाण पत्र सरकारी मनोचिकित्सक द्वारा ही दिया जाता है। यह एक संकट का मुद्दा है क्योंकि मध्यप्रदेश के दूसरे कई जिलों की तरह बड़वानी के जिला चिकित्सालय में भी कोई विशेषज्ञ मनोचिकित्सक नहीं है। स्वाभाविक है कि ऐसी अवस्था में उन तक योजनाओं का लाभ प्रशासनिक विसंगतियों के कारण नहीं पहुंच पा रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में कुल 11.31 लाख विकलांगों में से 8.9 लाख (लगभग 78 प्रतिशत) विकलांग गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। परन्तु इनमें से केवल 3.8 लाख लोगों को ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का लाभ मिल रहा है। विश्लेषण बताते हैं कि विकलांग लोगों की पहचान न होने, प्रमाण पत्र न होने और भ्रष्टाचार के कारण अब भी बहुत बड़े हिस्से को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। ऐसा साफ तौर पर महसूस होता है कि सरकार विकलांगता को गरीबी का मापदण्ड नहीं मानती है और इसके प्रमाण हैं गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की पहचान के सूचकांक। इन सूचकांकों में दो-तीन जोड़ी कपड़ों, पंखों, साईकिल को तो गरीबी का सूचक माना है परन्तु विकलांगता को किसी भी रूप में दर्ज ही नहीं किया गया।
विकास और समतामूलक समाज की स्थापना की दिशा में हो रहे प्रयासों में अब भी छिपी हुई गरीबी को भोगने वाले समूहों को नजरंदाज किया जा रहा है। उन समूहों की समस्याओं को व्यापक समस्याओं से अलग करके देखने का नजरिया जिस तरह विकसित हुआ है उससे उनकी पीड़ा चरम स्तर पर पहुंची है।
विकलांगता है क्या ?
विकालांगता वास्तव में एक प्रक्रिया से उत्पन्न हुई स्थिति है जिसको सामाजिक धारणायें व्यापक और भयावह रूप प्रदान करती हैं। इसकी अवधारणायें समाज पर निर्भर करती है क्योंकि इनका सीधा सम्बन्ध सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं से होता है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन अलग-अलग स्तरों पर परिभाषित करता है :-
1. अंग क्षति (Impairment) मानसिक, शारीरिक या दैहिक संरचना में किसी भी अंग का भंग, असामान्यहोना, जिसके कारण उसकी कार्यप्रक्रिया में कमी आती हो, वह अंग क्षति से जुड़ी अशक्तता होती है।
2. अशक्तता (Disability) अंग क्षति का उस स्थिति में होना जब प्रभावित व्यक्ति किसी भी काम को सामान्य प्रक्रिया में सम्पन्न न कर सके। यहां सामान्य प्रक्रिया उसे माना जाता है जिसे सामान्य व्यक्ति स्वीकार्य व्यवस्था में किसी काम को प्रक्रिया के साथ पूरा करता है।
3. असक्षमता (Handicap) यह अंग क्षति और अशक्तता के परिणाम स्वरूप किसी व्यक्ति के लिये उत्पन्न हुई दुखदायी स्थिति है। इसके कारण व्यक्ति समाज में अपनी भूमिका और दायित्वों का निर्वहन (आयु, लिंग, आर्थिक, सामाजिक और सास्कृतिक कारकों के फलस्वरूप) कर पाने में असक्षम हो जाता है।
विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर देने, उनके अधिकारों के संरक्षण और सहभागिता के लिये 1995 में बने अधिनियम के अनुसार जो व्यक्ति 40 फीसदी या उससे अधिक विकलांग है उसे चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित किया जायेगा। इसमें दृष्टिहीनता, दृष्टिबाध्यता, श्रवण क्षमता में कमी, गति विषयन बाध्यता, है। नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999 में आस्टिन, सेलेब्रल पल्सी और बहु-विकलांगता (जैसे मानसिक रोग के साथ अंधत्व) को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
मध्यप्रदेश की स्थिति
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कराये गये विशेश सर्वेक्षण से समाज में विकलांगता के शिकार व्यक्तियों की स्थिति का एक व्यापक चित्र उभरकर आता है। मध्यप्रदेश में कुल 1131405 व्यक्ति किसी न किसी किस्म की विकलांगता के शिकार हैं। इसका मतलब यह है कि ये लोग सरकार द्वारा तय विकलांगता की परिभाषा के अन्तर्गत आते हैं। प्रदेश की इस जनसंख्या का कुछ अलग-अलग बिन्दुओं के आधार पर विश्लेषण किया जा सकता है।
विकलांग व्यक्ति की आजीविका और आर्थिक स्थिति
- • प्रदेश में 44 फीसदी विकलांग व्यक्ति यानि 412404 व्यक्ति बेरोजगार हैं।
- • 287052 व्यक्ति दैनिक रूप से आय अर्जित करके जीवन यापन करते हैं और 281670 अपना खुद का काम करते हैं।
- • 1000 रूपये प्रति माह से कम कमाने वाले व्यक्तियों की संख्या 505472 है जबकि 5000 से ज्यादा आय अर्जित करने वाले की संख्या तीन प्रतिशत के आसपास है। सरकारी क्षेत्र में केवल 15955 लोग काम करते हैं।
सरकारी योजनाओं का लाभ
गरीबी विकलांगता की पीड़ा को चरम स्तर पर ले जाती है। प्रदेश की कुल सर्वेक्षित विकलांग जनसंख्या के 80 फीसदी यानी 889755 लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं। इनमें से 19667 व्यक्तियों को स्वरोजगार करने के लिये सरकारी सहायता मिली है और केवल 66962 को ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का लाभ मिलता है। एकीकृत प्रणाली का लाभ 42519 लोगों को और विशेश स्कूल शिक्षा का लाभ 5142 को ही मिला है।
क्या हैं इस समूह की अपेक्षायें?
सरकार का ही विश्लेषण कहता है कि अभी 387100 विकलांग व्यक्तियों की अपेक्षा है कि उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले। 158784 लोग स्वरोजगार स्थाापित करने के लिये सहयोग चाहते हैं जबकि 114304 युवा छात्रवृत्तिा चाहते हैं ताकि वे शिक्षा पूरी कर सकें। 175793 लोग आत्मनिर्भर होने के लिये कृत्रिम शारीरिक उपकरण चाहते हैं।
लोगों की पहचान और वंचित होने की प्रक्रिया
विकलांग या रोगी व्यक्तियों को प्रमाणपत्र दिये जाने के लिए जिलास्तर पर एक तीन सदस्यीय बोड़ गठित किया गया। प्रमाण पत्र पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी और विशेषज्ञ के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। इस प्रमाण पत्र के बिना व्यक्ति को विकलांगों के लिये चल रही कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सकता है। इस प्रक्रिया में मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को सबसे ज्यादा समस्या का सामना करना पड़ता है। मानसिक विकलांगो या रोगियों के लिये माण पत्र बनाने के लिये मानसिक रोग विशेषज्ञ की बाध्यता रखी गई है और स्वास्थ्य प्रशासन के पास जिला स्तर पर कोई विशेषज्ञ नहीं होता है इसलिए उन्हें परेशानी का सामना पड़ता है
वंचित समुदाय वे समुदाय होते हैं जिनका जन्म व्यापक समाज की मिथ्या मान्यताओं, ज्ञान और मानवीय भावनाओं के संगठित ह्रास के कारण होता है। अपने महत्व और अस्तित्व को दंभ के स्तर तक ले जाने की महत्वाकांक्षा के कारण एक समुदाय को ऐसे वर्ग की जरूरत होती है जिसे वह अपने सक्षम, उच्च और बेहतर होने का अहसास कर सके।
किसी भी परिवार में जब कोई बच्चा विकलांग पैदा होता है तो किसी को खुशी नहीं होती। उसका जन्म दुभाग्य का प्रतीक होता है। यह उदासी परिवार में ग्लानि और अवसाद का रूप ले लेती है। उन्हें लगता है कि ऐसे बच्चे के जन्म के कारण उन्होंने सामाजिक अपराध किया हैं। यह अवसाद उनके व्यवहार का धीरे-धीरे एक अहम् हिस्सा बनता जाता है, जिसके बारे में संभवत: उन्हें अहसास भी नहीं होता। इस व्यवहार और मान्यता के कारण बच्चा भी अपनी तथाकथित असमान्ता को महसूस करने लगता है। परिवार के साथ-साथ पड़ोसियों, रिश्तेदारों और उसके हम उम्रों के वैचारिक व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। तब बच्चे को दो तरह के व्यवहार का सामना करना पडता है। या तो उसे नजरअंदाज किया जाता है या फिर उसकी अतिविशेष देखभाल की जाती है। ये दोनों व्यवहार ही भेदभाव प्रदर्शित करने लगते हैं। ऐसे में शारीरिक विकलांगता, मानसिक विकलांगता तक पहुंचती है।
जब बच्चा ऐसे दौर में पहुंचता है जहां उसे दूसरे बच्चों के समूह में शामिल हाो चाहिये पर उसका असामान्यता का अहसास उसे उनसे दूर करता जाता है। यहां से अकेलापन उसके जीवन का हिस्सा बनता है। बच्चे के माता-पिता यह मान ही चुके होते है कि चूंकि वह दृष्टिहीन है या चलने में सक्षम नहीं है तो वह स्कूल कैसे जा पायेगा, कैसे पढ़ पायेगा? इन सवालों के बीच वे उसे स्कूल न भेजने का निर्णय ले लेते हैं। उसे हर रोज, हर पल किसी न किसी व्यवहार के कारण्ा विकलांग होने का अहसास होता है। ऐसे में जब बच्चा स्कूल नहीं जा पाता है या व्यापक समाज में शामिल नहीं हो पाता है तो उसकी क्षमताओं का विकास नहीं हो पाता है। वास्तव में यहां वह वंचितों की श्रेणी में आकर खड़ा हो जाता हे। जब वह बड़ा हो जाता है और उस उम्र में पहुंचता है जब अन्य व्यक्ति आत्मनिर्भर या सक्षम हो रहे होते हैं तब उसे अपने पिछड़ेपन का भी अहसान होने लगता है। यह पिछड़ापन आर्थिक और सामाजिक संदर्भों में होता है। यह एक स्थापित तथ्य है कि भीख मांगने वाले सभी व्यक्ति गरीब परिवारों के नहीं होते बल्कि बेहतर स्थिति वाले परिवारों के विकलांग व्यक्ति भी उपेक्षा और अकेलेपन के कारण यह पेशा अपनाकर आर्थिक बोझ कम करने की कोशिश में जुट जाते हैं।
यह एक तथ्य है कि हमारे समाज में 5 से 10 फीसदी लोग किसी न किसी तरह की शारीरिक क्षति, असक्षमता या फिर विकलांगता के साथ जीवन जीते हैं। वास्तव में यह स्थितियां शारीरिक और भौतिक रूप से अपनी उपस्थिति का जितना अहसास कराती हैं उससे ज्यादा उनके सामाजिक और मान्यता से जुड़े पहलू ज्यादा गंभीर (या चिंतनीय) हैं। वास्तव में विकलांगता के प्रति जो नजरिया बना हुआ है उस नजरिये ने समाज के इतने बड़े हिस्से को समाज से एक किस्म से अलग कर दिया है। यही नजरिया उन्हें व्यापक सन्दर्भों में अपंग से विपन्न बनाकर भूखे और दूसरों पर निर्भर जीवन जीने की दिशा में धकेलता है।
जो अपंग नहीं होते हैं वे शारीरिक संरचना की क्षति या किसी अंग की निष्क्रियता को जीवन की त्रासदी मानते हैं। अपंग व्यक्ति को तीन तरह के व्यवहार का जीवन में सामना करना पड़ता है-
- उन्हें उपेक्षा की नजरों से देखा जाता है।
- उनको तिरस्कार और दुर्भावनापूर्ण व्यवहार से जूझना पड़ता है।
- उनकी विशेष देखभाल की जाती है।
वास्तव में विकलांगता को व्यक्ति के भाग्य या उसके कर्मों के परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और इसी प्रस्तुति के चलते यह माना जाता है कि ऐसे लोग बेहतर समाज के सार्थक हिस्से नहीं हो सकते हैं। शनै:-शनै: उन्हें नकारा जाता है और वे व्यापक समाज से अलग होते चले जाते हैं। यह व्यवस्था मूलत: विकलांग और गैर-विकलांग व्यक्ति, दोनों की मान्यताओं के आधार पर ठोस रूप लेती गई है। इन्हीं मिथ्या मान्यताओं के कारण ये लोग उत्पादक भूमिका निभाने में सक्षम होने के बावजूद हर तरह से निष्क्रिय और उपेक्षित होने को
मजबूर हैं। जिन तीन तरह के व्यवहार का हमने जिक्र किया है वह तीनों व्यवहार उनके आत्मविश्वास और स्वयं के प्रति उनके अपने नजरिये को बहुत दोयम दर्जे का बना देते हैं। यह अहसास बहुत गहरे तक जड़ें जमा जाता है कि वे अन्तत: एक निरर्थक जीवन जीने की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।
- उपेक्षा का व्यवहार - व्यक्ति की शारीरिक, मनौवैज्ञानिक क्षति या असामान्यता के कारण जब व्यक्ति किसी कार्य या दायित्व को निभाने में या तो असक्षम हो जाता है या उसकी क्षमता कम हो जाती है। इन परिस्थितियों में उसका परिवार, इसके साथी या आस-पास का समुदाय यह मानने लगता है कि वह व्यक्ति समाज में उत्पादक भूमिका नहीं निभा सकता है। स्वाभाविक है कि उसके जीवन की सार्थकता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। ऐसी परिस्थिति में उसके अस्तित्व, उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया जाता है। अनुत्पादक होने का मिथ्या कलंक लग जाने के कारण उसके विचार भी घर-परिवार में महत्वहीन हो जाते हैं और उपेक्षा उसके जीवन की वास्तविकता बन जाती है।
- तिरस्कार और दुर्भावनापूर्ण व्यवहार - कहीं किसी स्तर पर यदि विकलांग या अपंग व्यक्ति किसी ऐसे परिवार या समुदाय से सम्बध्द है जिसमें व्यक्ति की तथाकथित अनुत्पादकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है वहां उसे तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े हुये वर्गों के विकलांगों के प्रति यही नजरिया है कि वे भीख मांगकर या गंदगी के ढेर से अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हैं। स्वच्छ और सभ्य मानव समाज इस व्यवहार से जोड़कर एक कलंकित और तिरस्कृत वर्ग को जन्म देता है। यह वर्ग वंचितों में भी वंचित वर्ग बनाता है।
- अति-विशेष व्यवहार - लोग विकलांग और किसी अंग विशेष की अपंगता के कारण कोई काम कर पाने में असक्षम हो सकते है। परन्तु परिवार और समुदाय की संवेदनशीलता के फलस्वरूप उनके साथ सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अति विशेष देखभाल पूर्ण व्यवहार किया जाता है। खास तौर पर जब छोटे बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार होता है तो उन्के मन में अपने असक्षम और अनुत्पादक होने के सम्बन्ध में धारणायें जड़ें जमाने लगती हैं। विशेष व्यवहार उन्हें कदम-कदम पर यह अहसास कराता है कि वे सामान्य बच्चे नहीं हैं, वे विकलांग हैं। वास्तव में यह परिवार या समुदाय के संवेदनशाील चरित्र पर सवाल नहीं है बल्कि मन्तव्य यह स्पष्ट करना है कि जब तक हम विकलांगता के मनौवज्ञानिक और सामाजिक सिध्दान्तों को नहीं समझेंगे तब तक ऐसे समुदायों को व्यापक और सामान्य समाज से अलग करके देखते रहेंगे।
गरीबी और विकलांगता का सम्बन्ध
मूलत: अनुभवों से यह सिध्द हुआ है कि गरीबी और विकलांगता के बीच गहरा सम्बन्ध है। भारत में 50 फीसदी बच्चों का गंभीर रूप से कुपोषित और 70 फीसदी महिलाओं का खून की कमी से ग्रस्त होना इस सम्बनध के तथ्यात्मक आधार हैं। इसके अलावा आज भी गरीब परिवारों में बच्चों के जन्म और उनकी मृत्यु की जो दर है वह स्थिति का भयावह चित्र प्रस्तुत करती है। छोटे-छोटे घरों में बहुत सारे लोगों के रहने के कारण होने वाली दुर्घटनायें गरीब परिवारों में विकलांगता बढ़ाने का काम करती है। गरीबों के लिए टीकाकरण और स्वास्थ्य सुविधओं की की वास्तविकता एक दूर का लक्ष्य है। जिसके कारण उन परिवारों में विकलांगता का स्तर बढ़ता जा रहा है। और विकलांग को अनुत्पादक होने का पर्याय मानने के कारण यह साफ नजर आता है कि गरीबों की गरीबी बढ़ती जाती है क्योंकि उनका कोई आर्थिक योगदान नहीं होता है।
गरीबी की आर्थिक-राजनीति का विकलांग समूहों पर गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह एक उल्लेखनीय पहलू है कि सामाजिक व्यवहार के कारण विकलांगता गरीबी का एक कारक होती है किन्तु भारत में जब गरीबों की पहचान की जाती है तो इसे गरीबी का कारण नहीं माना जाता है। योजना आयोग के दिशा निर्देशों के अन्तर्गत होने वाले गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की पहचान के कार्यक्रम में विकलांगता को गरीबी का सूचक ही नहीं माना गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि समुदाय में विकलांग का परिवार और परिवार में विकलांग व्यापक स्तर की गरीबी और उपेक्षा का सबसे बड़ा शिकार होता है।
विकलांगों की समाज में उपेक्षा सुनियोजित होती है। सामाजिक-राजनैतिक मान्यता यह है कि यदि विकलांग बच्चा लम्बा जीवन जीता है तो वह एक विकलांग वयस्क बनकर समाज पर एक आर्थिक बोझ बनेगा। उसके कारण संसाधनों का उपयोग नहीं हो पायेगा और उसकी कोई रचनात्मक भूमिका नहीं होगी।
विकास, गरीबी और सशक्तिकरण परिवर्तन की वर्तमान प्रक्रिया बहुत अहम् हिस्सा है। हम मान सकते है। कि विकास में सबकुछ शामिल है, पर अब ऐसा लगता है कि विकास में सबकुछ शामिल नहीं है। अब हर परिवर्तन को अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग सूचकों से मापने की जरूरत है। विकास की परिभाषा में यदि आज वंचित समुदायों की उपेक्षा बढ़ती जा रही है तो स्वाभाविक है कि उस परिभाषा का पुनरावलोकन करने की जरूरत है, यदि विकलांगता को गरीबी का सूचक नहीं माना जा रहा है तो उस पर गहन आत्मचिंतन करने की जरूरत है।
वर्तमान समय में विकास और गरीबी की परिभाषा राजनैतिक-अर्थव्यवस्था के संचालक तय करते है। यह एक अनुभवजन्य मान्यता है कि राजनीति का मतलब है शक्ति और नियंत्रण की क्षमता का उपयोग राजनीतिज्ञ उन्हीं क्षेत्रों में करते हैं जिनसे उन्हें या उनके वैचारिक समूहों को तात्कालिक लाभ मिले। वास्तव में ऐसे क्षेत्रों, जिनमें सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के परिवर्तन की जरूरत है, में अपनी शक्ति और संसाधनों के निवेश में नीति बनाने वालों की रूचि नहीं है। वे भी यही मानते है। कि विकलांग राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर एक बोझ होते हैं और उनका जीवन छोटा ही होना चाहिए। इस तथ्य को यदि कोई नकारना चाहे तो देश के राजनैतिक या आर्थिक क्षेत्र में इस मुद्दे पर हुये प्रयासों के तर्क देकर नकार सकता है; पर सवाल यह है कि ऐसे तथ्य आयेंगे कहां से ?
वास्तव में विकास का मतलब गरीबी की समस्या का व्यापक स्तर पर समाधान ढूंढ लेना नहीं है। गरीबी बहुस्तरीयर् दुभावना, विद्वेष और भेदभाव का एक सूचक है। जिसके कारण जब पृथ्वी एवं उसके संसाधनों का अपमानजनक दुरूपयोग होता है तो यह भौतिक रूप में सामने आती है और इसे भौतिक रूप मेुं महसूस करके ही उसका समाधान करने की सतत् कोशिशें की जाती हैं। गरीबी को भौतिक संसाधनों और तकनीकी प्रयासों से मिटा पाना असंभव है और विकलांगता का मुद्दा हमें इस व्यवस्था के पतन के छिपे हुये पहलुओं को उजागर करने मेें मदद करता है। यह मुद्दा हमारे बुनियादी मूल्यों और मान्यताओं को चुनौती देता है जिसके कारण विकलांगों का समूह अनायास ही एक वंचित और गरीब समुदाय का रूप ले बैठा।
विकलांगता से जुड़ी मिथ्या धारणाएं
- विकलांग व्यक्ति की उत्पादक और रचनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है।
- दीर्धावधि में वह समाज पर आर्थिक बोझ होता है।
- उनका पुनर्वास मंहगा और जटिल होता है।
- इसमें हर स्तर पर विशेषज्ञों और तकनीकी चिकित्सा सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
- विकलों व्यक्ति सामान्य सामाजिक प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकते हैं।
- विकलांगता का कारण व्यक्ति के कम और ग्रह-दोष है।
विकलांगता : सोच में बदलाव के साथ रोजगार गारण्टी
बोरलाय गांव में रहने वाला 21 साल का सुरेष धनोरा में मध्यप्रदेष ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत बन रही सड़क को समतल बनाने का काम कर रहा है। उसका नाम भी रोजगार कार्ड में दर्ज है और पिछले सात दिनों से लगातार वह मजदूरी कर रहा है। इस काम के एवज में उसे 61.37 रूपये की मजदूरी हर रोज मिल रही है। वह बड़े जतन से गर्दन झुकाये अपना काम कर रहा है। अब सवाल यह खड़ा होता है कि
सुरेश मजदूरी कर रहा है इसमें खास बात क्या है? यह तो मध्यप्रदेश के 43 लाख मजदूर भी कर रहे हैं क्योंकि रोजगार का अधिकार अब एक कानूनी हक बन गया है। परन्तु सुरेश उस 43 लाख की भीड़ में एक खास मुकाम रखता है। सुरेश दोनों आंखों से देख नहीं पाता है। हिरकराय गांव का वेस्तिया आदिवासी पहाड़ी पर चढ़ा हुआ है। उसके हाथ में गेंती है जिससे वह पहाड़ पर पानी को रोकने के उद्देश्य से खंती खोद रहा है। उसे हर रोज रोजगार गारण्टी योजना में न्यूनतम मजदूरी मिल रही है क्योंकि वह हर रोज निर्धारित लक्ष्य भी पूरा कर रहा है। यहां भी सवाल यही है कि वेस्तिया वही कर रहा है जो सामान्य मजदूर कर रहे हैं परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। वेस्तिया एक पैर से विकलांग है।
बड़वानी जिले में अब ऐसी कहानियों की सूची लम्बी होती जा रही है। मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में यह उल्लेख जरूर कर दिया गया है कि यदि विकलांग व्यक्ति रोजगार की मांग करता है तो उसे यह अधिकार दिया जायेगा। परन्तु इस सच्चाई में भी दो राय नहीं हो सकती है कि विकलांगता को हमेशा अक्षमता के रूप में ही परिभाषित किया गया और यह एक सामाजिक धारणा है कि विकलांग व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन में किसी भी तरह की उत्पादक भूमिका नहीं निभा सकते हैं। इतना ही नहीं इस वर्ग पर परिवार, राज्य और समुदाय को ने केवल आर्थिक संसाधनों का निवेश करना पड़ता है बल्कि समय और मेहनत भी इनकी देखभाल में बहुत लगती है। विकलांग व्यक्ति अपने शरीर के अंगों की विकलांगता से इतना पीड़ित नहीं होता जितना आर्थिक, सामाजिक दर्ुव्यवहार उसे प्रताड़ित करता है। ऐसे में संगठन, समुदाय और पंचायतों के प्रयासों से व्यापक सोच में बदलाव आना शुरू हुआ है। मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में रोजगार के अधिकार को शारीरिक श्रम करने की इच्छा के एवज में मिलने वाले रोजगार के अवसर के रूप में परिभाषित किया गया है। यहां विश्लेषक यह विरोधाभास पाते हैं कि एक ओर तो राज्य दैनिक मजदूरी के एवज में कठोर शारीरिक श्रम की मांग कर रहा है, वहीं विकलांगों को भी यही काम का अवसर दिया जा रहा है, जिसे शायद वे कर पाने में सक्षम नहीं होंगे।
परन्तु बड़वानी जिले में अब विकलांगता के संदर्भ में जड़ें जमा चुकी मिथ्या अवधारणाओं की जड़ें हिलना शुरू हो गई है। यहां 26 गांवों में 84 विकलांग मजदूर शारीरिक श्रम करके और योजना में शामिल किये गये अन्य कार्य करके रोजगार हासिल कर रहे हैं। इनमें केवल शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति ही शामिल नहीं है बल्कि कालीबेड़ी में बन रहे चेक डेम पर मानसिक रोग से ग्रसित पप्पू भी खुदाई का काम कर रहा है। पप्पू के अलावा 11 व्यक्ति मानसिक रोगियों के सन्दर्भ में बनी हुई धारणाओं को तोड़ने की इस पहल में सहभागी बने हैं। हमें यह उल्लेख करना होगा कि इस इलाके में विकलांगता के जरिये पैदा हुये सामाजिक वर्ग के प्रति होने वाले भेदभाव से संघर्ष करने के लिये तैयार हुये संगाति संगठन ने अहम् भूमिका निभाई है। संगठन के साथ जुड़े बिजय स्वाई विश्लेषण करते हुये स्पष्ट कहते हैं कि कुल जनसंख्या का 7 से 10 फीसदी हिस्सा किसी न किसी किस्म की विकलांगता का शिकार है। कुछ की विकलांगता नजर आती है कुछ की नजर नहीं आती है। फिर विकलांगता को छिपाने की कोशिश होती और इसी छिपाव के कारण विकलांगता का प्रभाव बढ़ता जाता है परन्तु यह भी एक संभावना है कि रोजगार गारण्टी योजना से मिले अवसरों से ऐसे व्यक्ति बाहर निकलेंगे जिससे संभवत: उनका उपचार हो सकेगा। ऐसे में क्या इस वर्ग को समाज से अलग किया जा सकता है? वे कहते हैं कि गरीबी और विकलांगता का बहुत सीधा जुड़ाव है। अगर बड़वानी का ही आंकड़ा लिया जाये तो यह जुड़ाव स्पष्ट हो जाता है। जिले में 17782 व्यक्ति विकलांग हैं जिनमें से 13052 लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं और रोजगार गारण्टी योजना इसलिये बहुत ही महत्वपूण्र् ा हो जाती है क्योंकि 87 प्रतिशत विकलांग गांवों में ही रह रहे हैं।
स्वाभाविक है कि भेदभावपूर्ण सोच के कारण विकलांग व्यक्ति समाज में सम्मानजनक उत्पादक भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। बड़वानी का अनुभव कई नई संभावनायें खड़ी करता है। व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये संगाति संगठनों ने जबरदस्त भूमिका निभाई है। हिरकराय गांव की आबादी जरूर 2300 से ज्यादा है किन्तु सत्ता राजनैतिक रूप से ताकतवर सरपंच की ही चलती रही है। इतिहास बताता है कि इस गांव में दिन और रात तय करने का अधिकार भी एक ही व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित रहा है। ऐसे में जब रोजगार गारण्टी कार्यक्रम शुरू हुआ तब वहां ट्रेक्टरों का भी उपयोग हो रहा था और पथरीली जमीन पर दस घंटे काम करने के बाद आदिवासी मजदूरों को 20 से 25 रूपये की मजदूरी दी जा रही थी। प्रकाश आदिवासी बताते हैं कि तब संगाति संगठन ने उपयंत्री और सरपंच से संघर्ष करने का निर्णय लिया। गांव के सारे काम रोक दिये गये, सरपंच को घेर लिया गया। ऐसी स्थिति में वहां पहली बार बराबरी के संवाद की स्थिति बनी। संगठन के दबाव के बाद ग्रामीण यांत्रिकी
विभाग के अधिकारियों ने काम की माप में बदलाव किया। तब कहीं उन्हें न्यूनतम मजदूरी मिलना शुरू हुई और ट्रेक्टर का उपयोग बंद हुआ। हिरकराय संगाति के चीमू भायला कहते हैं कि इस गांव में पिछले पांच सालों में लोगों के केवल एक दिन का काम मिला था परन्तु आज के दिन 25 लाख रूपये के काम चल रहे हैं; सड़क, पुलिया और वृक्षारोपण की हर जरूरत पूरी करने का अधिकार हमें मिला है। पर सबसे खास बात यह है कि अब हमको यह भी पता चला है कि अपने अधिकार की आवाज कहां-कहां उठाई जा सकती हैं वैसे तो सरकार ने बिना मांग के ही काम शुरू कर दिया था परन्तु हमने तो आवेदन देकर काम मांगा, पंचायत ने नहीं माना तब जनपद तक गये क्योंकि हम जानते हैं कि बिना कागज के अधिकार की लड़ाई संभव नहीं है।
आषाग्राम ट्रस्ट के कार्यकर्ता रामलखन कहते हैं कि विकलांगता को रोजगार के साथ जोड़कर काम करना चुनौतीपूर्ण भी और शायद सबसे सार्थक भी। ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिये क्योंकि अभी ऐसे व्यक्तियों को बोझ माना जाता है। समाज वहीं निवेश करता है जहां फायदा होता है और मानवता का नजरिया ही इसे बदल सकता है। अपनी रणनीति के संदर्भ में वे कहते हैं कि विकलांग व्यक्ति की पहचान उसके नाम से नहीं होती है; उसे लूला, लंगड़ा, बहरा, अंधा या पागल कहकर पुकारा जाता है। जब सम्बोधन में ही उलाहना, अपमान और तिरस्कार का भाव हो तो यह उम्मीद करना बहुत कठिन है कि उनके अधिकारों को भी पहचाना-स्वीकार किया जायेगा। संगाति ने एक संगठन के रूप में यही किया। वास्तविक विकलांगों को सरकारी प्रमाण पत्र दिलवाने से लेकर वन भूमि पर पट्टे दिलाने का काम इन संगठनों ने किया है और विकलांग ही इस संगठन के कर्ताधर्ता हैं। वास्तविकता यह है कि कभी भी ऐसे कामों की पहचान नहीं की गई जो विकलांग व्यक्ति अपनी क्षमता से कर सकें। ऐसे में आषाग्राम और संगाति ने मध्यप्रदेष ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत उन कामों को सूचीबध्द किया जिन्हें विकलांग व्यक्ति सर अंजाम दे सकते हैं। जब इस सूची पर हम नजर डालते हैं तो एक के बाद कई सवाल मन-मस्तिष्क में कौंध जाते हैं। पहला सवाल यही होता है कि क्या वृक्षारोपण का काम दोनों पैरों से विकलांग व्यक्ति नहीं कर सकता है या फिर बैठे-बैठे कुयें के अन्दर मजदूर द्वारा भरी गई मिट्टी की टोकरी को नहीं खींच सकता हैं? इसी तरह जब सुरेष की बात आती है तब पता चलता है कि सड़क निर्माण के काम में वह मिट्टी फैलाने और उसे एक सा करने का काम दृष्टिहीन होने के बावजूद सही ढंग से कर रहा था। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विकलांगता का पहला वार शरीर के अंग पर होता है पर अविश्वास व्यक्ति के आत्मविष्वास को तोड़कर रख देता है। मेणीमाता गांव में तेनसिंह पैरो से विकलांग होने के बावजूद कण्टूर खुदाई का काम कर रहा है पर इसके लिये गांव के लोगों ने उसके साथ समानता और सम्मान का व्यवहार करना शुरू कर दिया। पंचायत भी उसके साथ इंसानी व्यवहार करती है और कार्यस्थल पर मौजूद हर व्यक्ति उसकी मदद करता है। बिना आत्म विश्वास और सामाजिक विश्वास पैदा किये विकलांग व्यक्ति के प्रति बनी हुई मिथ्या धारणाओं को नहीं तोड़ा जा सकता है।
इस बदलावकारी प्रयास को बड़वानी विकासखण्ड की तलुनखुर्द और बजट्टाखुर्द पंचायतों ने नई दिशा दिखाई। बजट्टाखुर्द पंचायत के विकलांग पंच जगदीश कुमावत ने बाकायदा ग्रामसभा में यह प्रस्ताव रखा कि पंचायत के सभी 11 विकलांग व्यक्तियों के जॉब कार्ड बनाये जायें और बिना शर्त उन्हें रोजगार दिया जाये। वे कहते हैं कि यह तो सबके लिये गारण्टी की बात है तो फिर विकलांग किस आधार पर वंचित होंगे? समस्या यह है कि समाज हम पर सीधी नजर ही नहीं डालता है, जब भी डालता है तिरछी नजर ही डालता है। मतलब यह है कि जब तक हम खड़े होकर अपने हकों की पुकार नहीं करेंगे तब तक हमारी बात सुनी नहीं जायेगी। बस तभी पंचायत ने विकलांगों को एक इंसान की नजर से देखा और स्वीकार किया। इसी के साथ तलुनखुर्द पंचायत के युवा सरपंच प्यार सिंह ने भी इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया। इसी गांव के तिलक दोनों पैरों से विकलांग हैं। उसे पहले ट्रायसिकल मिली थी जिसे लेकर वह अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता था परन्तु जब उसे रोजगार गारण्टी योजना में काम मिला तो जैसे जिन्दगी को देखने का नजरिया ही बदल गया। मैंने पहली बार महसूस किया कि मैं भी तो घर के लिए रोटी कमा सकता हूं। सरपंच प्यारसिंह कहते हैं कि यह विष्वास करना कठिन है परन्तु सच है कि पिछले दो माह में तिलक ने अपने माता-पिता को बहुत सहयोग दिया है और पंचायत कभी भी उसके काम को कम नहीं आंकेगी। सरकार के नियम इंसान की मदद के लिये हैं न कि उसे प्रताड़ित करने के लिये; इसलिये हमने तय किया है कि तलुनखुर्द पंचायत मजदूरी के मानकों को तिलक के अनुरूप बनायेगी।
अब तक ऐसे 25 कामों की पहचान आषाग्राम कर चुका है जिन्हें शारीरिक रूप से विकलांग और मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति पूरी ऊर्जा से पूर्ण कर सकते हैं। इसमें कार्यस्थल पर बच्चों को संभालना, मिट्टी भरना, जमीन का समतलीकरण करना, पानी पिलाना, वृक्षारोपण का कार्य करना, मेढ़ बंधान करना जैसे कई काम शामिल हैं। यह जरूर है कि इस पहल को व्यापक समाज के स्तर पर चरितार्थ करने के लिये केवल कुछ संरचनायें बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि जरूरत है व्यापक समाज की सोच को बदलने की। हर एक को यह विचार जरूर करना होगा कि क्या विकलांग होने का मतलब असक्षम होना है?
वस्तुस्थिति
- प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड एजुकेशन फॉर द डिसएबल्ड द्वारा 1993 में किये गये एक अध्ययन के मुताबिक भारत में लगभग 2.5 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी विकलांगता से पीड़ित हैं।
- 1991 में नेशनल सेम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के आंकलन के अनुसार लगभग 10 करोड़ लोग किसी न किसी तरह की विकलांगता के शिकार हैं। हालांकि 2001 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या के 5 प्रतिशत से ज्यादा लोग अंग- क्षति या विकलांगता से जूझ रहे हैं।
- भारत में अभी विकलांगों के लिये 3000 से ज्यादा विशेष विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं। जिनमें से 900 स्कूल श्रवण बाधित विकलांगता, 400 दृष्टि बाधित विकलांगता, 700 गति बाधित (चलने में दिक्कत) विकलांगता और 1000 मानसिक रोग या विकलांगों के लिये संचालित हो रहे हैं।
- देश में अभी 50 हजार बच्चे ही इंटीग्रटेड एजूकेशन फॉर डिसएबल्ड चिल्ड्रन में नामांकित हैं।
मध्यप्रदेश में चुनौतियां
- प्रदेश में सामाजिक स्तर पर विकलांगता के शिकार व्यक्ति विकलांगता से ज्यादा समाज में व्याप्त श्रम से जूझते हैं। इस भ्रम को मिटाने के लिये कोई आंदोलनात्मक प्रयास प्रदेश में नहीं हुये हैं।
- अभी प्रदेश के कुल स्वास्थ्य बजट का एक बहुत छोटा सा हिस्सा विकलांगता की चुनौती से निपटने के लिये खच होता है।
- पंचायत स्तर पर अब तक विकलांगता प्रमाण पत्र जारी करने की सुविधा लोगों को नहीं मिली है।
- मानसिक विकलांगता का प्रमाण पत्र प्राप्त करना तो जैसे हिमालय पर्वत पर चढ़ने जैसा है।
- विकलांगता के मुद्दे पर अभी कोई व्यापक और स्पष्ट नीति का निर्माण भी नहीं हुआ है। इसे एक शारीरिक-चिकित्सकीय व्याधि ही माना जाता रहा है। जबकि इसका सामाजिक पहलू नजरंदाज होता रहा है।
Sachin Kumar Jain |