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बच्चों को रुलाता बजट

 
     
 

यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट बच्चों की समस्याओं और पोषण को लेकर कमोवेश यथास्थितिवादी है। ऐसा देश जिसकी 50 प्रतिशत से अधिक आबादी युवाओं/बच्चों की हो वहां उनके पोषण के प्रति आंख मूंद लेना 'हाराकरी' से ज्यादा कुछ नहीं है। बजट की वास्तविकता का विश्लेषण करता सारगर्भित आलेख।

नई नवेली सरकार का नया बजट आ गया हैं। सरकार में शामिल घटकों ने इसे अच्छा कहा तो स्वभावत: विपक्ष ने इसे जनविरोधी कहा। उद्योग जगत तो इस बजट से खासा नाराज है। बजट पर आई प्रतिक्रिया से यह तो साबित हो ही गया है कि शेयर बाजार समतामूलक विकास के पक्ष में नहीं है। वर्ष 2009-10 के बजट में सरकार ने थोड़ी ज्यादा दिखावटी पहल गांव के लिए कर दी तो बाजार धड़ाम से गिर गया। बाजार के (बुल मार्केट) बैल की सांस फूल गई। वह नाराज है कि प्रणव मुखर्जी ने गांव और गांव के लोगों की तरफ क्यों देखा। पिछले 15-20 सालों से जब भी गरीबी या सामाजिक क्षेत्रों की बात होती है तो सेंसेक्स गिरकर शेयर बाजार अपना गुस्सा दिखाता है। आश्चर्यजनक है कि 20 सालों की निजीकरण की प्रक्रिया के बाद मंदी के नाम पर अंतत: सरकार को ही पूरी अर्थव्यवस्था को संभालना पड़ रहा हैं। हर उद्योग बड़े अधिकार के साथ यह मांग कर रहा है कि उन्हें बेल आउट पैकेज मिले। अब सवाल यह है कि जब आप पहले ही करों में छूट ले चुके है और सरकार की लाखों एकड़ जमीनें मुफ्त या कौड़ियों के भाव अपनी अंटी में कर चुके हैं तो अब और लूट में क्या चाहते हैं। मतलब साफ है कि बाजार के लाभ कमाने का लालच अब आर्थिक हिंसा के स्तर पर जा पहुंचा है।

ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने पूरे बजट को वंचितों को सौंप दिया हो। इस बजट में सड़कों के निर्माण के लिए बजट में 23 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और सरकार का कहना है कि वह हर रोज राष्ट्रीय राजमार्ग की 20 किलोमीटर सड़कें बनाएगी। इससे विकास तो होगा पर साथ ही सीमेंट इस्पात, स्टील निर्माण क्षेत्र और अन्य उत्पादों के बाजार में भी सरकार के 50 हजार करोड़ रुपए आएंगे। यह बड़ी कंपनियों को पता है पर वह अपनी खुशी जाहिर नहीं करना चाहती हैं। प्रणव मुखर्जी ने बंगाल के जादू वाला पिटारा तो सभी के लिए खोला लेकिन यह बजट बच्चों को नहीं रिझा पाया। वैसे भी आम आदमी वास्तव में विकास के लिए नहीं बल्कि वोट के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। वर्ष 2004 के चुनावों के बाद से यह बात बार-बार सिध्द हो रही है। कांग्रेस को एक मंत्र मिल गया है कि चुटर-पुटर (30-40 हजार करोड़) कार्यक्रम लोगों के लिए चलाओ और उन्हें लॉलीपॉप देकर बड़े सौदे करते जाओ।

6 वर्ष तक के बच्चों के समग्र विकास की बात करें तो स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बच्चों में कुपोषण के मुद्दे को राष्ट्रीय शर्म निरुपित कर चुके हैं। लोकसभा के चुनावों में भी सोनिया गांधी, राहुल और मनमोहन सिंह ने चुनावी सभाओं में कुपोषण पर सघन अभियान चलाने का वायदा किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने आईसीडीएस के लोकव्यापीकरण के आदेश दिए हैं। यानी हर बच्चे और हर बसाहट के लिए आंगनवाड़ी केंद्र होना चाहिए। परंतु बजट में यह झलकता नहीं दिखता। महिला एवं बाल विकास के बजट में केवल 2 प्रतिशत की वृध्दि की गई है। जिससे ना तो आईसीडीएस का लोकव्यापीकरण हो पाएगा न कुपोषण की रफ्तार कम हो पाएगी। सरकार अब भी यह नहीं समझ रही है कि भारत में कुपोषण के कारण विकास की दर में 2-3 प्रतिशत की कमी आ जाती है।

स्कूली शिक्षा के संबंध में सरकार शायद यह तय कर चुकी है कि गुणवत्तापूर्ण एवं अनिवार्य बुनियादी शिक्षा के लिए निजीकरण के रास्ते खोल देना चाहिए। इसका परावर्तन बजट में दिखता है कि सरकार ने विगत वर्ष के बजट में 26800 करोड़ रुपए के प्रावधान में एक भी रुपए का इजाफा नहीं किया है। यहां तक कि सर्व शिक्षा अभियान में एक भी रुपए की बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। जबकि इसी यूपीए सरकार ने अपने विगत कार्यकाल में शिक्षा पर 6 प्रतिशत तक खर्च करने की बात कही थी, लेकिन अभी भी वह कोसों दूर है। प्रश्न उठता है कि बार-बार अपनी प्रतिबध्दता जाहिर करने के बावजूद सरकार ने शिक्षा के अधिकार वाले कानून के लिए बजट का आवंटन क्यों नहीं किया? वर्ष 2004 के चुनावों में नरेगा का वायदा किया गया और उसे लागू करने का फायदा कांग्रेस को मिला भी। इस बार उन्होंने खाद्य सुरक्षा अधिनियम का वायदा कर दिया और चुनाव जीत गए। अब वर्तमान सरकार यह अधिनियम बनाने की जल्दी में है, क्योंकि वोट का मामला है और अब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने जा रहे हैं। इस बात में थोड़ी शंका है कि कांग्रेस सरकार भुखमरी और गरीबी के प्रति बहुत प्रतिबध्द है। लेकिन विगत दो पंचवर्षीय से अटके शिक्षा बिल को लाने के संबंध में इस बजट में कहीं जिक्र भी नहीं किया है। यह सरकार की प्राथमिकताओं को प्रदर्शित करता है कि अनिवार्य एवं मूलभूत शिक्षा किस पायदान पर है?

आदिवासी विकास पर सरकार ने इस बजट में एक भी रुपए की बढ़ोत्तरी नहीं की है। जबकि हम सभी जानते हैं कि बच्चों के संबंध में बहुत सी योजनाएं आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा, समेकित बाल विकास सेवा, मध्यान्ह भोजन योजना आदि पर भी आदिवासी, विकास से राशि खर्च होती हैं। सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण की दिशा में भी केवल 100 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी यह दर्शाती है कि शासन की मंशा क्या है। देश का राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण में देश की स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत से परिचित कराता रहा है। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए नागरिकों के सबसे ज्यादा खर्च करना पड़ता है। सरकार स्वास्थ्य कार्यक्रम तो चला रही है पर इसे संवैधानिक अधिकार का दर्जा नहीं दे रही हैं। इसकी कारण हमारा स्वास्थ्य ढांचा बेहद लचर कमजोर और अप्रभावी बन गया है। जरुरी है कि बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य के संदर्भ में बी.पी.एल. जैसे सूचकों को हटा कर स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक सार्वजनिकीकरण किया जाए। सरकार ने तो इस बजट में भी लगभग 300 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी की है। इसमें से भी अधिकांश पैसा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को जाने वाला है जिसमें अधिकांश रूप से लक्षित हितग्राही हैं।

दरअसल में पूरा बजट का केन्द्रीय विश्लेषण यह कहता है कि उसके केन्द्र में बच्चा तो कहीं भी नहीं है। सरकार का बजट भाषण ही इससे शुरु होता है कि 9 फीसदी विकास दर हासिल करना सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है, लेकिन कमजोर एवं वंचित तबके का विकास शासन की प्राथमिकता का हिस्सा नहीं दिखता है। सरकार ने हर बार की तरह इस बार भी देश की रक्षा के लिए बजट 105600 से बढ़ाकर 141703 कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि रक्षा पर खर्च नहीं होना चाहिए लेकिन सवाल यह भी है कि बच्चों की आधी से ज्यादा आबादी कुपोषित है। लोग भुखमरी के साये में जी रहे हैं और सरकार अपनी प्राथमिकता रक्षा को बना रही है।

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सरकार ने बढ़ोत्तरी तो की है और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) में भी वृध्दि की है, इसके मायने यह नहीं कि सरकार हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम की मंशा रखती है। बल्कि यह पूर्ण योजना गांव के एक बड़े वर्ग (युवा, महिला, वृध्द, पुरुष) की आस बंधाती है क्योंकि यह जरुरी भी नहीं है कि सभी को काम मिल ही जाए। यह बड़ा वर्ग ही सरकार का वोट बैंक है। विगत पांच दशकों के चुनावी वातावरण और बजटों का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि विगत दशक या दो पंचवर्षीय में खाद्य सुरक्षा के सवालों को तरजीह देना शुरु हुआ है, क्योंकि इस दशक में न्यायपालिका ने अपना पक्ष सुनिश्चित करते हुए सरकार को इस हेतु बाध्य किया है। खाद्य सुरक्षा के मामले को आजकल एक रुपए किलो गेहूँ और 2 रुपए किलो चावल के रूप में बदला जा रहा है। यह लोगों को प्रत्यक्ष रूप से आलसी बनाए रखने की साजिश है। बजाए इसके कि नरेगा में न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाया जाए और लोगों की वित्तीय क्षमता बढ़ाई जाए।

सवाल जस का तस है कि बजट में या शासन की अन्य प्राथमिकताओं में बच्चों को तरजीह नहीं दी जाती है क्योंकि बच्चे वोट बैंक नहीं हैं और वे सरकार का तख्ता भी नहीं पलट सकते हैं। इसलिए हमें यह देखना और समझना होगा कि बच्चे कब शासन की जिम्मेदारी और प्राथमिकता में होंगे? सरकार को चाहिए कि पहले बुनियाद को साधे नहीं तो विकास रूपी इमारत खड़ी नहीं हो सकती है।

प्रशांत दुबे/सचिन कुमार जैन

 
     
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